आईना

आईने में देखता हूँ खुद को
और मुझे तुम नज़र आते हो
सोच में पड़ जाता हूँ
क्योंकि 
आईना पारदर्शी नहीं होता
फिर ये कैसे संभव है
सोचता हूँ फिर
तुम्हारे प्रेम में
कहीं मैं ही तो
पारदर्शी नहीं हो गया
जब भी देखता हूँ आईना
तुम ही नज़र आते हो

चित्र साभार- गूगल

तन्हाई के जंगल


तन्हाई के जंगल में 
भटकते हुए 
याद का पल
जब भीग जाता है 
अश्क़ों की बारिश में 
तब एक उम्मीद 
चुपके से आकर 
पोछ देती है 
अश्क़ों की नमी
और पहना देती है 
इंतज़ार के नये कपड़े

चित्र साभार- गूगल

जब तुम नहीं आते


अक्सर ही ऐसा होता है
उम्मीदों की उंगली थामे
दिल चल पड़ता है
तमन्ना की पथरीली राहों में
और चुभता है फिर
किसी की बेरुख़ी का कांटा
फिर लहूलुहान दिल
लौट पड़ता है
दर्द के दरख्त की तरफ
अक्सर ही ऐसा होता है


मन अकुला जाता है जब तुम नहीं आते
एक टीस सी उठती है हृदय में 
जैसे आ गया हूँ मैं प्रलय में 
आतुर हो नयन भटकते हैं 
अश्रु पलकों पर मचलते हैं 
ऋतु-रंग कुछ नहीं सुहाते
मन अकुला जाता है जब तुम नहीं आते... 

घर बनाने में

न तारे, चाँद, गुलशन औ' अम्बर बनाने में
जरूरी जिस कदर है सावधानी घर बनाने में

अचानक अश्क़ टपके और बच गई आबरू वरना
कसर छोड़ी न थी उसने मुझे पत्थर बनाने में

मैं सारी उम्र जिनके वास्ते चुन-चुन के लाया गुल
वो ही मसरूफ़ थे मेरे लिए खंज़र बनाने में

चित्र साभार- गूगल

सुबकते रहते हैं


याद से बारहा तेरी उलझते रहते हैं
सिमटते रहते हैं या फिर बिखरते रहते हैं

तेरा ख़याल भी छू ले अगर ज़ेहन को मेरे
रात दिन दोपहर हम तो महकते रहते हैं

इसलिये ही बनी रहती है नमी आँखों में
ख़्वाब कुछ छुपके पलक में सुबकते रहते हैं

चित्र साभार- गूगल

ईश्वर से प्रेम करना सिखाएं, डरना नहीं



आस्थावानों के लिए ईश्वर एक सार्वभौमिक शक्ति है, जिसे विभिन्न रूपों में पूजा जाता है। जिसे हम भक्ति कहते हैं, वो भी प्रेम का ही एक अंग है। प्रेम जब अपने चरम पर पहुंचता है, तो भक्ति में परिवर्तित हो जाता है, जिसे ज्ञानी प्रेमयोग भी कहते हैं। हम सब आस्थावान ईश्वर के किसी न किसी रूप की पूजा करते ही हैं।

हम में से बहुतेरे अमूमन एक गलती करते ही हैं, जो ईश्वर साक्षात प्रेम स्वरूप है, हम उसी से अपने से छोटों, खासकर बच्चों को डराकर रखते हैं। ऐसा मत करो नहीं तो ईश्वर पाप देंगे, वैसा मत करो नहीं तो ईश्वर दंड देंगे। लेकिन सोचने वाली बात ये है कि क्या ये कहने से बच्चे ऐसा करना बंद कर देते हैं। नहीं बल्कि इसका उल्टा प्रभाव पड़ता है और वे ईश्वर के समीप जाने की बजाय दूर होने लगते हैं। वे या तो अनिच्छा से पूजा-पाठ करते हैं या उनके मन में समाये डर के कारण। धीरे-धीरे वे अनमने मन से धार्मिक अनुष्ठानों में सम्मिलित होते हैं। उन्हें डर होता है कि कोई गलती हो गई तो, उन्हें पता नहीं क्या दंड मिले। और ऐसे में कोई अनहोनी हो जाये तो, वे अंधविश्वासी होने लगते हैं। ईश्वर का प्रेम जहां उन्हें आत्मविश्वासी बना सकता है, वहीं डर उन्हें अंधविश्वासी। बच्चों को ईश्वर से डराने की बजाय प्रेम करना सिखाएं। उनसे ये कह सकते हैं कि ईश्वर आप से बहुत प्रेम करते हैं, इसलिये ऐसा मत करो अन्यथा ईश्वर रुष्ट हो जाएंगे, ये कदापि न कहें ईश्वर क्रोधित हो जाएंगे। साथ ही इस तरह भी कहा जा सकता है कि ईश्वर ने मनुष्यमात्र, परिवार, समाज के लिये कुछ नियम और अनुशासन बनाया हुआ है, जिसका पालन करना चाहिये, अन्यथा ईश्वर रुष्ट हो जाते हैं, लेकिन वे हम सब से बहुत प्रेम करते हैं और हम सब का ध्यान रखते हैं।

ईश्वर सभी जीवों से प्रेम करते हैं, इसलिए हमें भी उनसे प्रेम करना चाहिए। आरम्भ से ही ईश्वर के प्रति अनुराग उत्पन्न करने वाली बातें कही जाए, न कि डर उत्पन्न करने वाली। आज जहां युवा पीढ़ी के बारे में कहा जा रहा है कि वो अपनी संस्कृति और परंपराओं से कट रही है, वहीं उनमें ईश्वर के प्रति प्रेम जगाया जाए ताकि वे छोटे-बड़े धार्मिक क्रियाकलापों में सम्मिलित हों। हमारे बहुतेरे धार्मिक क्रियाकलाप हमारी संस्कृति और परंपरा का हिस्सा भी हैं, इस तरह हम उन्हें इससे कटने से भी बचा पाएं। वर्तमान में जितना पूजा-पाठ बढ़ा है, उतना ही ईश्वर से लोग विमुख भी हुए हैं, हालांकि ईश्वर निजी आस्था का विषय है, फिर भी कहीं न कहीं बचपन से ईश्वर के नाम पर बनाये गए डर की भी महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। चूंकि मैं ईश्वर के प्रति पूर्ण आस्थावान हूँ, इसलिए मेरा मानना है, कि जो प्रेम स्वरूप परमानंद है, उससे प्रेम करना सिखाएं, डरना नहीं।

चित्र साभार- गूगल

रफ़्तार

गतांक से आगे...
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दो घंटे बाद
रिपोर्टर- कैसे हुई दुर्घटना
चश्मदीद- भैया हम कई सालों से यहां चाय की दुकान चला रहे हैं, जब से सरकार ने चौड़ी और चिकनी सपाट सड़क बनाई है, आए दिन दुर्घटनाएं हो रही हैं।
आज भी ये लड़के बहुत ज्यादा तेजी से मोटर साइकिल चलाते हुये आ रहे थे और सुना है सबने बहुत शराब भी पी रखी थी। तेज गाड़ी चलाने की होड़ और मस्ती-मज़ाक करते-करते आपस में ही टकरा गए। गाड़ी की रफ़्तार तेज होने के कारण गाड़ी सड़क पर घिसट गई और लड़के खून से लथपथ हो गए, हेलमेट नहीं पहने होने के कारण सबके सिर पर चोट आयी थी और खून काफी ज्यादा बह गया था। जिससे एक दो लड़कों की मौत तो यहीं हो गई थी।
रिपोर्टर- किसी बड़ी गाड़ी ने तो टक्कर नहीं मारी।
चश्मदीद- अरे नहीं-नहीं इतनी चौड़ी सड़क है, आने जाने का अलग-अलग रास्ता, फोरलेन सड़क है। वैसे भी दिन में तो सड़क ज्यादातर खाली ही रहती है,भारी वाहन तो रात में गुजरते हैं।

3 घंटे बाद
रिपोर्टर- सर, सड़क दुर्घटना पर मेरी रिपोर्ट तैयार है।
संपादक- क्या तुम्हारी रिपोर्ट में।
रिपोर्टर- सर, लड़के अपनी गलती से दुर्घटना का शिकार हुए हैं, इसमें किसी की गलती नहीं है। सड़क लगभग खाली थी और सभी लड़के ड्राइविंग के समय शराब पिये हुए थे।
संपादक- अच्छा! अब ख़ामोश रहना और ये बात बाहर किसी से मत कहना। सेठ जी हमारे बड़े विज्ञापनदाता हैं, क्या समझे।
रिपोर्टर- लेकिन सर...
संपादक- कहा न चुप रहो और सुनो अब तुम ये खबर नहीं बनाओगे।
तभी संपादक का फोन बजता है और थोड़ी देर बाद फोन काटते हुए अपने खास रिपोर्टर को बुलाता है और उसको सारी बात समझाता है।
संपादक- इस दुर्घटना की रिपोर्टिंग तुम बनाओ और इस दुर्घटना के लिए पूरी तरह से सरकार और प्रशासन को ही जिम्मेदार ठहराना।
समझ गए न...पत्रकार, संपादक की ओर देखता है और फिर जोर का अट्टहास गूंजता है।

दूसरे दिन सुबह
शहर के प्रमुख अखबारों की हेडलाइन...
प्रशासन की लापरवाही और अदूरदर्शिता ने मासूमों की जिंदगी छीनी,
सड़क निर्माण में नहीं हुआ सही मापदंडों का पालन,
सरकार ने किया सभी मृतक लड़कों के परिजनों को एक-एक करोड़ के मुआवजे का ऐलान...
चित्र साभार-गूगल

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