Sunday, August 20, 2017

लम्हा-ए-विसाल था


शबे-वस्ल तेरी हया का कमाल था 
सुबह देखा तो आसमां भी लाल था 

 कटे हैं यूँ हर पल ज़िन्दगी के अपने 
नफ़स नफ़स में वो कितना बवाल था  

जवाब देते अहले-जहां को, तो क्या 
तुझी से बावस्ता हर एक सवाल था 

 चमकता है जो मेरी आँखों में अब भी 
वो रूहानी पल जो लम्हा-ए-विसाल था 

 कटे ज़िन्दगी इस तरह कि कहें सब 
नदीश सच में जैसा भी था बस कमाल था


चित्र साभार-गूगल

Wednesday, August 16, 2017

प्यार आपका मिले

गुलों की राह के कांटे सभी खफ़ा मिले
मुहब्बत में वफ़ा की ऐसी न सज़ा मिले

अश्क़ तो उसकी यादों के क़रीब होते हैं
तिश्नगी ले चल जहाँ कोई मैक़दा मिले

कहूँ कैसे मैं कि इस शहर-ए-वफ़ा में मुझको
जितने भी मिले लोग सभी बेवफ़ा मिले

राह में रौशनी की, थे सभी हमराह मेरे
अँधेरे बढ़ गए तो साये लापता मिले

आओ तन्हाई में दो-चार बात तो कर लो
महफ़िल में तुम हमें मिले तो क्या मिले

क्या यही हासिल-ए-वफ़ा है, परेशान हूँ मैं
कुछ तो आंसू, ख़लिश ओ दर्द के सिवा मिले

आप पे हो किसी का हक़ तो वो नदीश का हो
और मुझको ही फ़क़त प्यार आपका मिले
चित्र साभार- गूगल

Sunday, August 13, 2017

अधिकार याद रहे कर्तव्य भूल गए

15 अगस्त को भारत वर्ष में स्वतंत्रता दिवस बड़े ही हर्षोल्लास और धूमधाम से मनाया जाता है। हर्ष इस बात का कि इस दिन हमें आजादी मिली और धूम इस बात की कि अब हम पूरी स्वतत्रंता से अपनी मनमानी कर सकते हैं। गाहे-बगाहे हम स्वतंत्रता की बात करते हुए अपने अधिकारों के लिये लड़ते हैं। जो मन होता है कह देते हैं और जब हमारे कहे का विरोध होता है तब इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार कहते हुए सही ठहराते हैं। हम अपने अधिकारों के लिये पूरी शक्ति से लड़ते हैं और इसका अतिक्रमण होने पर पुरजोर विरोध भी करते हैं, लेकिन अधिकारों की लड़ाई में हम अपने कर्तव्य भूल जाते हैं। ज्ञात रहे कि हमें संविधान ने 6 मौलिक अधिकार दिए हैं, लेकिन हमारे 11 मूल कर्तव्य भी हैं। ये सही है कि हमें अपने अधिकारों के प्रति सजग रहना चाहिए, लेकिन अपने कर्तव्यों को भी नहीं भूलना चाहिये।
संविधान ने हमें जो मौलिक अधिकार दिए गए वो इसलिए ताकि कोई हमारी आज़ादी न छीन सके, हमारा शोषण न कर सके। लेकिन अधिकारों को पाकर हम इतने उन्मुक्त न हों जाएं कि अपने कर्तव्यों को भूल जाएं और इससे हमारे समाज और देश का अपयश हो। हमें संविधान द्वारा मूल रूप से सात मौलिक अधिकार प्रदान किए गए थे, जिसमें समानता का अधिकार, स्वतंत्रता का अधिकार, शोषण के विरुद्ध अधिकार, धर्म, संस्कृति एवं शिक्षा की स्वतंत्रता का अधिकार, संपत्ति का अधिकार तथा संवैधानिक उपचारों का अधिकार। हालांकि, संपत्ति के अधिकार को 44वें संशोधन द्वारा संविधान से हटा दिया गया था।

हमारे 6 मौलिक अधिकार
समानता का अधिकार-
समानता का अधिकार संविधान के प्रमुख अधिकारों में से एक है। जिसमें सामूहिक रूप से कानून के समक्ष समानता तथा गैर-भेदभाव के सामान्य सिद्धांत शामिल हैं तथा सामूहिक रूप से सामाजिक समानता को आगे बढ़ाते हैं। ये अधिकार कानून के समक्ष समानता की गारंटी देता है, इसके साथ ही भारत की सीमाओं के अंदर सभी व्यक्तियों को कानून का समान संरक्षण प्रदान करता है।
स्वतंत्रता का अधिकार-
स्वतंत्रता के अधिकार के तहत छ: प्रकार की स्वतंत्रता को शामिल किया गया है जो सिर्फ भारतीय नागरिकों को ही उपलब्ध हैं। इनमें भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, एकत्र होने की स्वतंत्रता, हथियार रखने की स्वतंत्रता, भारत के राज्यक्षेत्र में कहीं भी आने-जाने की स्वतंत्रतता, भारत के किसी भी भाग में बसने और निवास करने की स्वतंत्रता तथा कोई भी व्यवसाय अपनाने की स्वतंत्रता।
शोषण के खिलाफ अधिकार-
शोषण के विरुद्ध अधिकार, जिसमें राज्य या व्यक्तियों द्वारा समाज के कमजोर वर्गों का शोषण रोकने के लिए कुछ प्रावधान किए गए हैं।
धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार-
धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार जो सभी नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान करता है और भारत में धर्मनिरपेक्ष राज्य सुनिश्चित करता है। संविधान के अनुसार, यहां कोई आधिकारिक राज्य धर्म नहीं है और राज्य द्वारा सभी धर्मों के साथ निष्पक्षता और तटस्थता से व्यवहार किया जाना चाहिए।
सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकार-
सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकार, उन्हें अपनी विरासत का संरक्षण करने और उसे भेदभाव से बचाने के लिए सक्षम बनाते हुए सांस्कृतिक, भाषाई और धार्मिक अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा के लिये हैं।
संवैधानिक उपचारों का अधिकार-
संवैधानिक उपचारों का अधिकार नागरिकों को अपने मौलिक अधिकारों के अतिक्रमण के विरुद्ध सुरक्षा के लिए भारत के सर्वोच्च न्यायालय में जाने की शक्ति देता है।
हमारे 11 मूल कर्तव्य
1. संविधान का पालन तथा उसके आदर्शों, संस्थाओं और राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान-
भारत के प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वह संविधान का पालन करे और उसके आदर्शों, संस्थाओं, राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान का आदर करे।
2. राष्ट्रीय आन्दोलन के प्रेरक आदर्शों का पालन-
प्रत्येक भारतीय नागरिक का कर्तव्य है कि वह स्वतन्त्रता के लिए हमारे राट्रीय आन्दोलन को प्रेरित करने वाले उच्च आदर्शों को हृदय में संजोये रखे और उनका पालन करे।
3. भारत की सम्प्रभुता, एकता और अखण्डता की रक्षा-
प्रत्येक भारतीय नागरिक का यह कर्तव्य है कि वह भारत की सम्प्रभुता, एकता और अखण्डता की रक्षा करे और उसे अक्षुण्ण बनाये रखे। इसे भारतीय नागरिकों के सर्वोच्च कर्तव्य की संज्ञा दी जा सकती है।
4. देश की रक्षा और राष्ट्र सेवा-
प्रत्येक भारतीय नागरिक का यह कर्तव्य है कि वह देश की रक्षा करे और बुलाये जाने पर राष्ट्र की सेवा करे।
5. भारत के लोगों में समरसता और भ्रातृत्व की भावना का विकास-
भारत के सभी भागों में समरसता और समान भ्रातृत्व की भावना का विकास करे, जो धर्म, भाषा, प्रदेश या वर्ग पर आधारित सभी भेदभाव से परे हो और ऐसी प्रथाओं का त्याग करे जो स्त्रियों के सम्मान के विरूद्ध हैं।
6. समन्वित संस्कृति की गौरवशाली परम्परा की रक्षा-
हमारी समन्वित संस्कृति की गौरवशाली परम्परा का महत्व समझे और संरक्षण करे।
7. प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा और सभी प्राणियों के प्रति दया भाव-
प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि प्राकृतिक पर्यावरण की, जिसके अन्तर्गत वन, झील, नदी और वन्य जीव भी हैं रक्षा करे और उनका सम्वर्द्धन करे तथा प्राणी-मात्र के प्रति दयाभाव रखे।
8. वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद और ज्ञानार्जन का विकास-
प्रत्येक नागरिक की कर्तव्य है कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद और ज्ञानार्जन तथा सुधार का भावना का विकास करे।
9. सार्वजनिक सम्पत्ति की सुरक्षा व हिंसा से दूर रहना-
प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि सार्वजनिक सम्पत्ति को सुरक्षित रखे व हिंसा से दूर रहे।
10. व्यक्तिगत तथा सामूहिक उत्कर्ष का प्रयास-
प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि व्यक्तिगत व सामूहिक गतिविधियों के सभी क्षेत्रों में उत्कर्ष की ओर बढ़ने का सतत प्रयास करे जिससे राष्ट्र निरन्तर बढ़ते हुए प्रगति और उपलब्धि की नवीन ऊंचाइयों को छू सके।
11. जो माता-पिता व संरक्षक हों, वे छः से चौदह वर्ष के बीच की आयु के बच्चों को शिक्षा प्राप्त करने के अवसर प्रदान करे।

Saturday, August 5, 2017

महके है तेरी याद से


तूफ़ान में   कश्ती  को उतारा नहीं होता
उल्फ़त का अगर तेरी किनारा नहीं होता

ये सोचता हूँ, कैसे गुजरती ये ज़िन्दगी
दर्दों का जो है, गर वो सहारा नहीं होता

मेरी किसी भी रात की आती नहीं सुबह
ख़्वाबों को अगर तुमने संवारा नहीं होता

बढ़ती न अगर प्यास ये, आँखों की इस कदर
अश्क़ों को ढलकने का इशारा नहीं होता

महरूम हुए लोग वो लज्ज़त से दर्द की
जिनको भी दर्द-ए-ग़ैर गवारा नहीं होता

उभरे है अक़्स तेरा ख़्यालों में जब मेरे
आँखों में  कोई  और नज़ारा  नहीं होता

महके है तेरी याद से वो पल बहुत नदीश
जो  साथ तेरे  हमने  गुजारा  नहीं  होता

चित्र साभार-गूगल

Sunday, July 30, 2017

जिंदगी की तरह


प्यार हमने किया जिंदगी की तरह
आप हरदम मिले अजनबी की तरह


मैं भी इन्सां हूँ, इन्सान हैं आप भी
फिर क्यों मिलते नहीं आदमी की तरह

मेरे सीने में भी इक धड़कता है दिल
प्यार यूँ न करें दिल्लगी की तरह


दोस्त बन के निभाई है जिनसे वफ़ा
दोस्ती कर रहे हैं दुश्मनी की तरह

हमको कोई गिला ग़म से होता नहीं
ग़र ख़ुशी कोई मिलती ख़ुशी की तरह


आज फिर से मेरे दिल ने पाया सुकूं
सोचकर आपको शायरी की तरह


ग़म की राहों में जब भी अँधेरे बढ़े
अश्क़ बिखरे सदा चांदनी की तरह


काश दिल को तुम्हारे ये आता समझ
इश्क़ मेरा नहीं हर किसी की तरह


याद आई है जब भी तुम्हारी नदीश
तीरगी में हुई रौशनी की तरह


चित्र साभार-गूगल

Wednesday, July 26, 2017

मौसम दिखाई देता है



कितना ग़मगीन ये आलम दिखाई देता है
हर जगह दर्द का मौसम दिखाई देता है

दिल को आदत सी हो गई है ख़लिश की जैसे
अब तो हर खार भी मरहम दिखाई देता है

तमाम रात रो रहा था चाँद भी तन्हा
ज़मीं का पैरहन ये नम दिखाई देता है

न आ सका तुझे अश्क़ों को छिपाना अब तक
हँसी के साथ-साथ ग़म दिखाई देता है

जहाँ पे दर्द ने जोड़े नहीं कभी रिश्ते
वहाँ का जश्न भी मातम दिखाई देता है

ग़मों की दास्तां किस को सुनाता मैं नदीश
न हमनवां है न हमदम दिखाई देता है

चित्र साभार- गूगल

Monday, July 24, 2017

कहकशां बनाते हैं


पोशीदा बातों को सुर्खियां बनाते हैं
लोग कैसी-कैसी ये कहानियां बनाते हैं

जिनमें मेरे ख़्वाबों का नूर जगमगाता है
वो मेरे आंसू इक कहकशां बनाते हैं


फासला नहीं रक्खा जब बनाने वाले ने
क्यों ये दूरियां फिर हम दरम्यां बनाते हैं

फूल उनकी बातों से किस तरह झरे बोलो
जो सहन में कांटों से गुलसितां बनाते हैं

.

जब नदीश जलाती है धूप इस ज़माने की
हम तुम्हारी यादों से सायबां बनाते हैं

चित्र साभार- गूगल

Sunday, July 23, 2017

छांव बेच आया है-क़तआत


चला शहर को तो वो गांव बेच आया है
अजब मुसाफ़िर है जो पांव बेच आया है
मकां बना लिया माँ-बाप से अलग उसने
शजर ख़रीद लिया छांव बेच आया है
-
तेरे ही साथ को सांसों का साथ कहता हूँ
तुझी को मैं, तुझी को कायनात कहता हूँ
तेरी पनाह में गुज़रे जो चंद पल मेरे
बस उन्ही लम्हों को सारी हयात कहता हूँ
-
प्यार की रोशनी से माहताब दिल हुआ
तेरी इक निगाह से बेताब दिल हुआ
हजार गुल दिल में ख़्वाबों के खिल गए
तेरी नज़दीकियों से शादाब दिल हुआ
-
पल-पल बोझल था, मगर कट गई रात
सहर के उजालों में सिमट गई रात
डरा रही थी अंधेरे के ज़ोर पर मुझे
जला जो दिले-नदीश तो छंट गई रात
-
-
रंग भरूँ शोख़ी में आज शाबाबों का
रुख़ पे तेरे मल दूँ अर्क गुलाबों का
होंठों का आलिंगन कर यूं, होंठों से
हो जाये श्रृंगार हमारे ख़्वाबों का
-
किनारों से बहुत रूठा हुआ है
कलेजा नाव का सहमा हुआ है
पटकती सर है, ये बेचैन लहरें
समंदर दर्द में डूबा हुआ है
-
चित्र साभार-गूगल

Saturday, July 22, 2017

जुगनू से बिखर जाते हैं

जब भी यादों में सितमगर की उतर जाते हैं 
काफ़िले दर्द के इस दिल से गुज़र जाते हैं

तुम्हारे नाम की हर शै है अमानत मेरी 
अश्क़ पलकों में ही आकर के ठहर जाते हैं

किसी भी काम के नहीं ये आईने अब तो
अक्स आँखों में देखकर ही संवर जाते हैं

इस कदर तंग है तन्हाईयाँ भी यादों से
रास्ते भीड़ के तनहा मुझे कर जाते हैं

देखकर तीरगी बस्ती में उम्मीदों की मिरे
अश्क़ ये टूटकर जुगनू से बिखर जाते हैं

बसा लिया है दिल में दर्द को धड़कन की तरह
ज़ख्म, ये वक़्त गुजरता है तो भर जाते हैं

खिज़ां को क्या कभी ये अफ़सोस हुआ होगा
उसके आने से ये पत्ते क्यों झर जाते हैं

बुझा के रहते हैं दिये जो उम्मीदों के नदीश
रह-ए-हयात में होते हुए मर जाते हैं 

चित्र साभार- गूगल

Thursday, July 20, 2017

वफ़ा की आँच


जलते हैं दिल के ज़ख्म ये पाके दवा की आँच
होंठों को है जलाती मेरे अब दुआ की आँच 

अश्क़ों के शरारे समेट कर तमाम रोज
ख़्वाबों को जगाये है मेरे क्यूं मिज़ा की आंच

सोचा था ख्यालों से मिलेगा तेरे सुकून 
लेकर गयी क़रार ये राहत-फ़ज़ा की आँच 

सौदागरी नहीं है, ये है ज़िंदगी मेरी 
रखिये अलग ही इससे नुक्सानो-नफ़ा की आँच 

महफूज़ कहाँ रक्खूँ ये जज़्बात दिल के मैं 
लगती है हर तरफ ही यहाँ तो ज़फ़ा की आँच 

दरिया ये कोई आग का आई है करके पार
पिघला रही है मुझको ये ठंडी हवा की आँच 

क्या हो गया है अब तेरे वादों की धूप को
इसमें बची नहीं है ज़रा भी वफ़ा की आँच

लेके नदीश अपने साथ बर्फ़-ए-दर्द चल 
झुलसा ही दे न तुझको ये तेरी अना की आँच


*चित्र साभार- गूगल

बेकल बेबस तन्हा मौसम



बिखरी शाम सिसकता मौसम
बेकल बेबस तन्हा मौसम

तन्हाई को समझ रहा है
लेकर चाँद खिसकता मौसम

शब के आंसू चुनने आया
लेकर धूप सुनहरा मौसम

चाँद चौदहवीं का हो छत पर
फिर देखो मचलता मौसम

जुल्फ चांदनी की बिखराकर
बनकर रात महकता मौसम

खिलती कलियों की संगत में
फूलों सा ये खिलता मौसम

तेरी यादों की बूंदों से
ठंडा हुआ दहकता मौसम

धूप-छांव बनकर नदीश की
ग़ज़लों में है ढलता मौसम

Wednesday, July 19, 2017

देश कहाँ है

इन दिनों देश में एक विचित्र सा वातावरण निर्मित हो गया है। लोगों और समुदायों का आपसी विरोध, देश विरोध तक जा पहुंचा है। इससे न देश में प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है, बल्कि सात समंदर पार भी देश की छवि धूमिल हो रही है।

इन दिनों स्थिति ये है कि एक पक्ष कहे कि स्वेदशी अपनाओं तो दूसरा पक्ष देशी कंपनियों की बुराई आरम्भ कर देता है, वहीं दूसरा पक्ष कहे कि ये गलत है, तो पहला पक्ष उसे सही साबित करने में जुट जाता है और इनके बीच की लड़ाई में देश कहीं खो जाता है। देश प्रथम की भावना और मानसिकता का पूरी तरह लोप हो चुका है। कैसी विडंबना है कि कोई ये नहीं सोचता कि देश बचा रहेगा तो हम बचे रहेंगे।

इन सब में एक तीसरा पक्ष भी है, जो बहुत ही भयावह है। जब जब देश के साथ खड़े होने की बात आती है, तीसरे पक्ष का इतिहास बताता है कि वो दुश्मनों के साथ ही रहा है। इन पक्षों के आपसी विरोध में देश कहीं नहीं होता। होता है तो बस स्वहित, लोभ और शक्ति सम्पन्न बनने की हवस। वर्तमान में व्यक्ति पूजा ने देश और देशहित को कहीं पीछे धकेल दिया है। आज सभी पक्षों में आपसी विरोध इतना हो चुका है कि सब एक दूसरे को नेस्तनाबूद कर देना चाहते हैं। आज सब कुछ सोचा जा रहा है लेकिन देश के बारे में नहीं।

*रेखाचित्र-अनुप्रिया

Tuesday, July 18, 2017

जो भी ख़लिश थी दिल में


जो भी ख़लिश थी दिल में एहसास हो गयी है
दर्द निस्बत मुझे कुछ खास हो गयी है

वजूद हर ख़ुशी का ग़म से है इस जहाँ में
फिर जिंदगी क्यूँ इतनी उदास हो गयी है

चराग़ जल रहा है यूँ मेरी मोहब्बत का
दिल है दीया, तमन्ना कपास हो गयी है

शिकवा नहीं है कोई अब उनसे बेरूखी का
यादों में मोहब्बत की अरदास हो गयी है

नदीश मोहब्बत में वो वक़्त आ गया है
तस्कीन प्यास की भी अब प्यास हो गयी है

*चित्र साभार- गूगल

Sunday, July 16, 2017

सीने से लगाये रखना

ख़्वाब की तरह से आँखों में छिपाये रखना
हमको दुनिया की निगाहों से बचाये रखना

बिखर न जाऊँ कहीं टूट के आंसू की तरह
मेरे  वजूद  को  पलकों  पे  उठाये  रखना

आज है ग़म तो यक़ीनन ख़ुशी भी आएगी
दिल में इक शम्मा तो उम्मीदों की जलाये रखना

तल्ख़  एहसास से  महफ़ूज रखेगी तुझको
मेरी  तस्वीर  को  सीने  से  लगाये  रखना

ग़ज़ल  नहीं, है  ये  आइना-ए- हयात  मेरी
अक़्स जब भी देखना एहसास जगाये रखना

ग़मों के  साथ मोहब्बत, है  ये आसान नदीश
ख़ुशी की ख्वाहिशों से खुद को बचाये रखना



*चित्र साभार-गूगल


Thursday, July 13, 2017

आदमी से आदमी

रखता नहीं है निस्बतें किसी से आदमी
रिश्तों को ढ़ो रहा है आजिज़ी से आदमी

धोखा फ़रेब खून-ए-वफ़ा रस्म हो गए
डरने लगा है अब तो दोस्ती से आदमी

मिलती नहीं हवा भी चराग़ों से इस तरह
मिलता है जिस तरह से आदमी से आदमी

शिकवा ग़मों का यूँ तो हर एक पल से है यहाँ
ख़ुश भी नहीं हुआ मगर ख़ुशी से आदमी

अच्छा है कि  नदीश मुकम्मल नहीं है तू
पता है कुछ नया किसी कमी से आदमी

*चित्र साभार-अनुप्रिया

Saturday, July 8, 2017

मौसम है दिल में

वीरानियों का वो आलम है दिल में
मर्ग़-ए-तमन्ना का मातम है दिल में

ठहरा हुआ है अश्कों का बादल
सदियों से बस एक मौसम है दिल में



धुंधला रही है तस्वीर-ए-ख़्वाहिश
उम्मीदों का हर सफ़ह नम है दिल में

मुझको पुकारा है तूने यक़ीनन
ये दर्द शायद तभी कम है दिल में

हंसकर हंसी ने, हंसी में ये पूछा
बताओ नदीश क्या कोई ग़म है दिल में

Tuesday, July 4, 2017

मार देते हैं

लड़कपन को भी, जो दिल में है अक्सर मार देते हैं
मेरे ख़्वाबों को सच्चाई के मंज़र मार देते हैं

वफ़ाएं अपनी राह-ए-इश्क़ में जब भी रखी हमने
हिक़ारत से ज़माने वाले ठोकर मार देते हैं

नहीं गैरों की कोई फ़िक्र मैं अपनों से सहमा हूँ
बचाकर आँख जो पीछे से खंज़र मार देते हैं

कभी जब सांस लेती है मेरे एहसास की तितली
यहाँ के लोग तो फूलों को पत्थर मार देते हैं

कहाँ मारोगे कितने मारोगे तलवार से बोलो
सुना है लफ्ज़ से ही लोग लश्कर मार देते हैं
ये लहरों के कबीले ज़ुस्तज़ू में किसकी पागल हैं
पलट कर बारहा साहिल पे जो सर मार देते हैं

कभी तो खोदकर देखो नदीश ज़िस्म की तुरबत
मिलेंगी ख्वाहिशें हम जिनको अंदर मार देते हैं

*चित्र साभार-गूगल

Sunday, July 2, 2017

औलाद का फर्ज़

नहीं अब तुम्हें नौकरी नहीं मिल सकती...
ऐसा न कहो सेठ जी नौकरी न रही तो मैं और मेरा परिवार भूखा मर जायेगा...मुन्ना ने गिड़गिगते हुए चमन सेठ से कहा।
चमन सेठ-तो बिना बताए आठ महीने कहाँ चला गया था, इतने दिन पेट कैसे भरा तेरा, अब तुझे नौकरी नहीं मिलेगी मुन्ना, मैंने दूसरा आदमी रख लिया है।
ऐसा न करो सेठ जी, मैं कहाँ जाऊंगा, सालों तक आपके यहां नौकरी की है, अब दूसरा ठिकाना कहाँ ढूँढू, मुन्ना फिर गिड़गिड़ाया।
तुझे पहले ये सब याद नहीं रहा, जो अब ये सब कह रहा है, आखिर गया कहाँ था तू, चमन सेठ ने मुन्ना को डपटते हुए कहा।
गांव चला गया था सेठ जी, पिता जी बीमार थे, उनकी सेवा करते इतने दिन गुजर गए, मुन्ना ने कहा।
चमन सेठ- अरे और कोई नहीं है घर में उनकी सेवा के लिए, जो तू आठ महीने गायब रहा।
मुन्ना-नहीं है सेठ जी, कोई नहीं मेरे सिवा। मेरे माँ-पिता ने अपना फर्ज निभाया और अब मुझे अपना फर्ज निभाना है। पिता की सेवा का अवसर मिला ये तो मेरा सौभाग्य है, ज्यादा दिन उनकी सेवा नहीं कर पाया इसका दुख है। कितने कष्ट सहकर उन्होंने मुझे पाला पोसा था।
चमन सेठ-बस कर, ये तो हर माँ-बाप का फर्ज़ होता है, इसमें नई बात क्या है।
मुन्ना-हाँ सेठ जी बच्चों का पालन पोषण हर माँ-बाप का फर्ज होता है, तो क्या औलाद का कोई फ़र्ज़ नहीं।
चमन सेठ- ठीक है, चुप कर आ जाना कल से।
मुन्ना- बहुत बहुत कृपा है आपकी सेठ जी। इतना कह कर मुन्ना चला गया।
इधर मुन्ना के जाने के बाद चमन सेठ के कान में ये शब्द हथौड़े की तरह पड़ रहे थे, तो क्या औलाद का कोई फर्ज़ नहीं। तीन महीने से उसके पिता भी तो अस्पताल में भर्ती हैं और वो तीन बार भी नहीं गया उनसे मिलने।
मुन्ना के ये शब्द चमन सेठ को बार बार बेचैन कर रहे थे, उसे रात में नींद भी अच्छे से नहीं आई।
सुबह होते ही चमन सेठ जल्दी से तैयार होकर अस्पताल पहुंचा और पिता के पैरों के पास बैठ गया। पिता ने आंख खोलकर देखा तो चमन सेठ पिता से लिपट कर फूट-फूट कर रोने लगा। पिता ने धीरे से सिर पर हाथ फेर के कहा- चमन मेरे बेटे मुझे कोई गिला नहीं तुमसे।
चमन ने कहा-मुझे क्षमा कर दो पिता जी।
इधर पिता बेटे के सिर पे हाथ फेर रहे थे, उधर आंसुओं से धुल के मन का मैल साफ हो रहा था।
*रेखाचित्र-अनुप्रिया

Saturday, July 1, 2017

अच्छा नहीं लगता

मंज़र दिल का उदास अच्छा नहीं लगता
तुम नहीं होते पास अच्छा नहीं लगता

तेरी क़दबुलन्दी से नहीं इनकार कोई
लेकिन छोटे एहसास, अच्छा नहीं लगता

जैसे भी हैं हम रहने दो वैसा ही हमको
बनके कुछ रहना खास अच्छा नहीं लगता

जब से तेरी यादों ने बसाया है घर दिल में
ये क़ाफ़िला-ए-अन्फास अच्छा नहीं लगता

ये मुखौटों से कह दो जाकर नदीश अब
सच का इतना भी पास अच्छा नहीं लगता

*चित्र साभार-गूगल

Sunday, June 25, 2017

संवारा नहीं होता

तूफ़ान में   कश्ती  को उतारा नहीं होता
उल्फ़त का अगर तेरी किनारा नहीं होता

ये सोचता हूँ, कैसे गुजरती ये ज़िन्दगी
दर्दों का जो है, गर वो सहारा नहीं होता

मेरी किसी भी रात की आती नहीं सुबह
ख़्वाबों को अगर तुमने संवारा नहीं होता

बढ़ती न अगर प्यास ये, आँखों की इस कदर
अश्क़ों को ढलकने का इशारा नहीं होता

महरूम हुए लोग वो लज्ज़त से दर्द की
जिनको भी दर्द-ए-ग़ैर गवारा नहीं होता

उभरे है अक़्स तेरा ख़्यालों में जब मेरे
आँखों में  कोई  और नज़ारा  नहीं होता

महके है तेरी याद से वो पल बहुत नदीश
जो  साथ तेरे  हमने  गुजारा  नहीं  होता
* रेखाचित्र-अनुप्रिया

Wednesday, June 21, 2017

जलते शहर से

न मिले चाहे सुकूं तेरी नज़र से
बारहा गुजरेंगे पर उस रहगुज़र से

जिसके होंठो पे तबस्सुम की घटा है
आज पी ली है उसी के चश्मे-तर से

आपने समझा दिया मतलब वफ़ा का
आह उट्ठी है मेरे टूटे ज़िगर से

ग़मज़दा एहसास हैं, तन्हाइयां है
लौट आये हैं मुहब्बत के सफ़र से


फ़ोटो साभार-गूगल

आजमा कर दोस्तों को जा रहे हैं
हम लिए तबियत बुझी, जलते शहर से

थाम लेगा लग्ज़िश में हाथ मेरा
है नदीश उम्मीद मेरी, हमसफ़र से

Monday, June 19, 2017

तुम कभी आओ तो

तुम कभी आओ तो
मैं घुमाऊँ तुमको
खण्डहर सी ज़िन्दगी के
उस कोने में जहाँ
अब भी पड़ीं हैं
अरमानों की अधपकी ईंटें
ख़्वाबों के अधजले टुकड़े
अहसास का बिखरा मलबा
उम्मीद का भुरभुरा गारा
तुम कभी आओ तो
मैं दिखाऊँ तुमको
खुशियों की बेरंग तस्वीरें
अश्कों का लबालब पोखर
धोखों के घने जाले
रिश्तों की चौड़ी दरारें
तुम कभी आओ तो

*रेखाचित्र-अनुप्रिया

Saturday, June 17, 2017

आँखों में छिपाये रखना

ख्वाब की तरह से आँखों में छिपाए रखना
हमको दुनिया की निगाहों से बचाए रखना

बिखर न जाऊं कहीं टूटकर आंसू की तरह
मेरे वजूद को पलकों पे उठाए रखना

आज है ग़म तो यक़ीनन ख़ुशी भी आएगी
दिल में एक शम्मा तो उम्मीदों की जलाए रखना


तल्ख़ एहसास से महफूज़ रखेगी तुझको
मेरी तस्वीर को सीने से लगाए रखना

ग़ज़ल नहीं, है ये आइना-ए-हयात मेरी
अक्स जब भी देखना एहसास जगाए रखना

ग़मों के साथ मोहब्बत है ये आसान नदीश
ख़ुशी की ख्वाहिशों से खुद को बचाए रखना 

*रेखाचित्र-अनुप्रिया

Friday, June 16, 2017

पतझड़ के बाद की बहार

शेष भाग...
अपने कमरे पहुंच के मनु की आँखे नम हो गई। उसके कानों में बार-बार पापा की बात ही गूँज रही थी। उसने जैसे तैसे खुद को सयंत किया। इतने आर्ष का फोन आ गया, लेकिन उसने काट दिया।
इधर फोन कटने से आर्ष भी परेशान हो रहा था।
उधर विनय मनु और आर्ष के रिश्ते को लेकर परेशान था। उसे सिर्फ दोनों परिवारों के बीच जो बड़ा आर्थिक अंतर था, वो बात परेशान किए जा रही थी।
जैसे तैसे ये दिन गुज़र गया। दूसरे दिन उसने महसूस किया कि मनु गुमसुम है, लेकिन उसने कुछ नहीं कहा, वहीं मनु पूरी कोशिश कर रही थी कि वो सामान्य नज़र आये। इसी तरह कुछ दिन बीत गए। अगले रविवार को आर्ष का फोन विनय के पास आया...
हेलो अंकल मैं आर्ष बोल रहा हूँ
हाँ कहो आर्ष.. विनय ने सामान्य होते हुए कहा
मेरे मम्मी-पापा आपसे मिलना चाहते हैं, आर्ष ने जवाब दिया
लेकिन... कुछ कहते हुए विनय रुक गया और फिर कहा ठीक है, कब मिलने आ रहे हो
आज शाम ही, आर्ष ने जवाब दिया
आज शाम, विनय ने हड़बड़ाते हुए कहा
हाँ, आप परेशान न होइए और कुछ तामझाम करने की भी जरूरत नहीं,  हम लोग शाम 7 बजे आएंगे..आर्ष बोला और फोन काट दिया
फोन कटने के विनय ने अरु को आवाज़ दी...
अरु कहाँ हो यार, जल्दी आओ
क्या हुआ, तेजी से आती अरु ने पूछा
अरे आर्ष का फोन आया था, आज शाम अपने मम्मी-पापा के साथ घर आ रहा है
आज शाम, अरे इतने जल्दी तैयारी कैसे होगी अरु ने चिंता जताई
हाँ वही तो, आर्ष तो कह रहा है कि कुछ करने की जरूरत नहीं, लेकिन शहर की इतनी बड़ी शख्सियत घर आये तो कुछ करना ही होगा न.. विनय ने कहा
अरु तुम घर को थोड़ा व्यवस्थित कर लो और हाँ नए पर्दे वगैरह लगा लो मैं बाजार से नास्ते पानी की व्यवस्था कर के आता हूं
ऐसा कहकर विनय चला गया
विनय के जाते ही अरु ने मनु को आवाज़ दी और आर्ष के आने की बात बताई
आर्ष के आने की खबर सुन मनु के चेहरे पे हल्की सी मुस्कान आ गई, लेकिन उसके मन में अब भी पापा की बात ही घूम रही थी।
शाम को निर्धारित समय पर आर्ष अपने मम्मी पापा के साथ मनु के घर पे था
बैठक में बैठे आयुर्वेदाचार्य जी ने विनय से कहा कि हम मनु को अपने घर की बहू बनाना चाहते हैं।
 विनय के मन में काफी कुछ चल रहा था, उसकी सबसे बड़ी शंका दोनों परिवारों के बीच का आर्थिक अंतर था, जो बहुत ज्यादा था। आयुर्वेदाचार्य की जी गिनती शहर के बड़े रईसों में होती है, जिसे लेकर विनय काफी असहज था और उसके लग रहा था, कि कहीं मनु को वहां परेशानियां न हो। समाज और शहर के लोगों के बीच होने वाली तरह-तरह की बातें को लेकर विनय परेशान था और उस समय भी उसका ध्यान आयुर्वेदाचार्य जी की बात पर नहीं था।
विनय को खोया देख कर आयुर्वेदाचार्य जी ने फिर कहा, कहां खोये हैं विनय बाबू
विनय ने एकदम चौंक कर देखा, जी कुछ नहीं बेटी की शादी की बात है न इसलिए बहुत कुछ सोचना पड़ता है, ये कहते हुए विनय ने बात संभाली।
अरे विनय बाबू ज्यादा मत सोचिये हमारी भी एक बेटी है, इस बात को अच्छी तरह समझते हैं, इसलिए मैं खुद आपके पास आया हूँ, हमें मनु बहुत पसंद हैं और हम इसे अपने घर की बहू बनाना चाहते हैं।
जी आप मनु से मिल चुके हैं, विनय ने चौंक कर पूछा...
हाँ, जब आर्ष को देखने आती थी, तब हमसे भी मिलती थी, सच कहें तो हमने मनु का उसी समय पसंद कर लिया था और हम इनकी शादी की बात करने वैसे भी आते, लेकिन अब ये दोनों एक दूसरे को पसंद करते हैं और शादी करना चाहते हैं, तो हमें क्या एतराज होना चाहिए।
लेकिन आपके और हमारे बीच जो अंतर है, उसका भय है हमें, विनय ने कहा।
अरे आप तो नाहक ही परेशान हो रहे हैं, विनय बाबू। आयुर्वेदाचार्य जी ने कहा देखिये बच्चों की खुशी देखिये, बाकी सब भूल जाईये, रही अंतर की बात तो वहां कोई समस्या नहीं है, बस आप हाँ कर दीजिये, आपकी बेटी को कभी कोई परेशानी नहीं होगी।
आयुर्वेदाचार्य की जी के आग्रह को विनय एकदम से मना नहीं कर पाया, फिर भी उसने कुछ दिन सोचने का समय माँग लिया।
आयुर्वेदाचार्य जी के जाने के बाद विनय और अरू में मनु को लेकर काफी देर तक बात हुई। विनय अब भी सशंकित था, इसलिए उसने दूसरे दिन आयुर्वेदाचार्य जी को इस रिश्ते के लिए मना कर दिया और मनु के लिए दूसरा लड़का ढूँढने की तैयारी की जाने लगी।
दिन बीतने के साथ ही मनु को भी अपना जीवन भारी लग रहा था, उसे बार-बार आर्ष की याद उदास कर रही थी, इस बीच उसने आर्ष से बात करना भी काफी कम कर दिया था। जैसे जैसे आर्ष उसे दूर होता दिखाई देता वैसे वैसे उसे लगता कि अब बहार कभी नहीं आयेगी। उसे हर तरफ पतझड़ ही दिखाई दे रहा था।
इधर विनय के मना कर देने के बाद आर्ष भी बहुत परेशान था और मनु की स्थिति भी बहुत खराब थी, लेकिन वो पापा के सामने सामान्य रहने की नाटक करती रही। इस तरह छै महीने का समय बीत गया, लेकिन मनु के लिए विनय कोई योग्य वर नहीं ढूँढ पाया।
एक दिन शाम को अचानक घर की घंटी बजी तो विनय ने दरवाजा खोला सामने आयुर्वेदाचार्य जी को देखकर एकदम से चौंक गया, फिर बोला आईये अंदर आईये
अंदर आने के बाद सोफे पर बैठते हुए आयुर्वेदाचार्य जी बोले, विनय बाबू आप क्या सोच रहे हैं और आपके मन में क्या शंका है मैं नहीं जानता, लेकिन इन दोनों बच्चों के मन को समझ रहा हूँ, इसलिए आपके पास आया हूँ, कृप्या इन बच्चों की खुशी मत छीनों। आपके मन में जो भी है आप नि:संकोच मुझसे कह सकते हैं।
आयुर्वेदाचार्य जी के इस तरह कहने पर विनय ने अपने मन की बात कह दी, देखिये आयुर्वेदाचार्य जी हम सामान्य आर्थिक स्थिति की लोग हैं, वहीं मैं एक बेटी का बाप हूँ, मुझे अपनी बेटी की चिंता है। वो आपकी सोसायटी में कैसे खुद को ढाल पायेगी।
अच्छा तो इन बातों को लेकर परेशान हैं विनय बाबू, आयुर्वेदाचार्य जी ने कहा मैं समझ सकता हूँ, लेकिन आप को मैं विश्वास दिलाता हूँ, जो आपकी शंकायें व्यर्थ हूँ जो आप सोच रहे हैं, वैसा कभी नहीं होगा, आपकी बेटी बहू कम बेटी बनकर ज्यादा रहेगी। रही बात आर्थिक अंतर की तो रहन-सहन और खान-पान के मामले हम और आप बिल्कुल बराबर हैं, ये बात तो मनु भी जानती है, आयुर्वेदाचार्य जी ने कहा और ज्यादा शंका हो तो आईये कभी हमारे घर।
ठीक है हम जल्दी ही आयेंगे, विनय ने जवाब दिया। इसके बाद आयुर्वेदाचार्य जी चले गये।
उनके जाने के बाद मनु और विनय के बीच बहुत देर तक इसी विषय पर बात होती, फिर दोनों ने तय किया कि एक बार वे आयुर्वेदाचार्य जी के घर जायेंगे। अगले रविवार को दोनों आयुर्वेदाचार्य जी घर पहुंचे, जहां उन्हें सच में काफी आश्चर्य हुआ कि शहर के इतने बड़े रईस और इतना साधारण रहन-सहन। दोनों इस बात से काफी प्रभावित हुये और फिर आयुर्वेदाचार्य जी के परिवार से मिलकर उन्हें काफी अच्छा लगा, जिसके बाद विनय ने मनु और आर्ष के रिश्ते के लिए हांमी भर दी।
रिश्ते की बात पक्की होते ही दोनों की कुण्डलियां मिलाई गई। कुण्डलियां मिलाने वाले ज्योतिष ने इनकी शादी के लिए साफ मना कर दिया, कुण्डली नहीं मिल रही है, शादी करना शुभ नहीं होगा। ज्योतिष की बात ने एक बार फिर आर्ष और मनु को जुदा कर दिया। इस बार आयुर्वेदाचार्य जी भी थोड़ा परेशान थे, लेकिन अपने बेटे की खुशी के लिए वे मनु को बहू बनाने के लिए तैयार थे, लेकिन विनय फिर सशंकित हो उठा
विनय को समझाते हुए आयुर्वेदाचार्य जी ने कहा देखिये विनय बाबू कुण्डली का मिलान न होना बहुत बड़ी समस्या नहीं है, वैसे भी अब हम आधुनिक युग की ओर बढ़ रहे हैं, हमें इन बातों पर ध्यान नहीं देना चाहिए।
विनय ने सशंकित होकर कहा, आयुर्वेदाचार्य जी मुझे मनु के भविष्य की चिंता है, आगे पता नहीं क्या हो जाये।
वहां बहार का मौसम आते-आते फिर मनु की जीवन में पतझड़ शुरू हो गया, लेकिन इस बार मनु खुद को संभाल नहीं पाई और उसकी आँखों से आंसुओं का सैलाब उमड़ पड़ा। ये देख अरू भी परेशान हो उठी, अब उसे लगा कि मनु की खुशी आर्ष के साथ ही है। कुछ देर सोचने अरू ने निश्चय कर लिया कि मनु के लिए अब वो कुछ करेगी, आखिर वो उसकी माँ है।
इधर आर्ष की हालत देखकर आयुर्वेदाचार्य जी एक बार फिर विनय से बात करने की ठानी।
उधर रात में कमरे में पहुंच कर बातों-बातों में अरू ने विनय से पूछा सुनो जी, वो प्रकाश की बेटी का कुछ पता चला। विनय, हाँ अब तो दोनों परिवार में सब अच्छा हो गया और प्रकाश बता रहा था कि उसकी बेटी बहुत खुश है और उसके सास-ससुर भी अच्छे हैं।
अच्छा अरू ने आश्चर्य से पूछा हाँ, विनय जवाब दिया।
सुनो आप सोचो अगर मनु ने ऐसा किया होता तो, लेकिन हमारी बेटी ने ऐसा नहीं किया। उसने हमें विश्वास में लिया, हमारी खुशी और इज्जत का ध्यान रखा। अब हमें भी अपनी बेटी की खुशी के बारे सोचना चाहिए। जब प्रकाश की बेटी बिना कुण्डली मिलाये शादी कर के खुश है तो हमें भी इस बारे में ज्यादा नहीं सोचना चाहिए।
अब विनय को सब कुछ समझ में आने लगा और उसने अरू से कहा तुम ठीक कह रही हो। मैं कल ही आयुर्वेदाचार्य जी से मिलता हूँ।
दूसरे दिन विनय और अरु मनु को लेकर आयुर्वेदाचार्य जी के घर पहुंचे।
आईये विनय बाबू, आयुर्वेदाचार्य जी ने विनय को घर में देखकर कहा।
क्षमा चाहता हूँ आयुर्वेदाचार्य जी, लेकिन मुझे लगता है, आपका कहना ठीक है हमें ज्यादा नहीं सोचना चाहिए।
अब बच्चों की खुशी के लिए हमें कुछ बातों पर ध्यान नहीं देना चाहिए।
विनय के ऐसा कहते ही आयुर्वेदाचार्य जी ने विनय को गले से लगा लिया।
इधर मनु के मन में फिर से पतझड़ के बाद की बहार की नई कोपलें फूटने लगी थीं।
समाप्त

Thursday, June 15, 2017

बेक़रार बहुत थे

रस्ते तो ज़िन्दगी के साज़गार बहुत थे
ख़ुशियों को मगर हम ही नागवार बहुत थे

बिखरे हुये थे चार सू मंज़र बहार के
बिन तेरे यूँ लगा वो सोगवार बहुत थे

ये जान कर भी अहले-जहां में वफ़ा नहीं
दुनिया की मोहब्बत में गिरफ़्तार बहुत थे

 थी नींद क़ैद आंसुओं की ज़द में रात भर
आँखों में चंद ख़्वाब बेक़रार बहुत थे

झुलसे मेरी वफ़ा के पांव आख़िरश नदीश
या रब तेरे यक़ीन में शरार बहुत थे
चित्र साभार- गूगल

Tuesday, June 13, 2017

आँख में आंसू आये हैं

बनकर तेरी याद की ख़ुश्बू आये हैं
दर्द के कुछ कस्तूरी आहू आये हैं

रात अमावस की औ" यादों की टिमटिम
ज्यों राहत के चंचल जुग्नू आये हैं

भेजा है पैगाम तुम्हारे ख़्वाबों ने
बनकर कासिद आँख में आंसू आये हैं

महका-महका हर क़तरा मेरे तन का
हम जबसे तेरा दामन छू आये हैं

जब भी बादल काले-काले दिखे नदीश
ज़हन में बस तेरे ही गेसू आये हैं
रेखाचित्र-अनुप्रिया

Saturday, June 10, 2017

चंद अशआर


न तारे, चाँद, गुलशन औ' अम्बर बनाने में
जरूरी जिस कदर है सावधानी घर बनाने में

अचानक अश्क़ टपके और बच गई आबरू वरना
कसर छोड़ी न थी उसने मुझे पत्थर बनाने में

मैं सारी उम्र जिनके वास्ते चुन-चुन के लाया गुल
वो ही मसरूफ़ थे मेरे लिए खंज़र बनाने में
बिछड़ते वक़्त तेरे अश्क़ का हर इक क़तरा
लिपट के रास्ते से मेरे तर-ब-तर निकला

ख़ुशी से दर्द की आँखों में आ गए आंसू
मिला जो शख़्स वो ख़्वाबों का हम सफ़र निकला

रोज दाने बिखेरता है जो परिंदों को
उसके तहखाने से कटा हुआ शजर निकला

हर घड़ी साथ ही रहा है वो नदीश मेरे
दर्द का एक पल जो ख़ुशियों से बेहतर निकला

तस्कीन यूँ मेरे अश्क़ों को मयस्सर होगी
अपने दामन में इन्हें आज बिखर जाने दो

पांव के छालों ने लिख दी है कहानी मेरी
अब न पूछो मिरा अहवाले-सफ़र जाने दो

चित्र साभार-गूगल

Friday, June 9, 2017

मगर चाहता हूँ

मुहब्बत में अपनी असर चाहता हूँ
वफ़ा से भरी हो नज़र, चाहता हूँ

तेरा दिल है मंज़िल मेरी चाहतों की
नज़र की तेरी रहगुज़र चाहता हूँ

कभी बांटकर मेरी तन्हाईयों को
अगर जान लो किस कदर चाहता हूँ

वफ़ा दौर-ए-हाज़िर में किसको मिली है
मेरे दोस्त तुझसे मगर चाहता हूँ

सफ़र में तुझी को नदीश जिंदगी के
मैं अपने लिये हमसफ़र चाहता हूँ


Thursday, June 8, 2017

संवरना है अभी

अपने होने के हर एक सच से मुकरना है अभी
ज़िन्दगी है तो कई रंग से मरना है अभी

तेरे आने से सुकूं मिल तो गया है लेकिन
सामने बैठ ज़रा मुझको संवरना है अभी

ज़ख्म छेड़ेंगे मेरे बारहा पुर्सिश वाले
ज़ख्म की हद से अधिक दर्द उभरना है अभी

निचोड़ के मेरी पलक को दर्द कहता है
मकीन-ए-दिल हूँ मैं और दिल में उतरना है अभी

आज उसने किया है फिर से वफ़ा का वादा
इम्तिहानों से मुझे और गुजरना है अभी


बाद मुद्दत के मिले तुम तो मुझे याद आया
ज़ख्म ऐसे हैं कई जिनको कि भरना है अभी

हुआ है ख़त्म जहाँ पे सफ़र  नदीश तेरा
वो  गाँव  दर्द  का  है और ठहरना है अभी

पतझड़ के बाद की बहार

क्या हुआ इतना परेशान क्यों हो?
अरे कुछ नहीं अरु, वो मेरा दोस्त है न प्रकाश उसकी बेटी ...
क्या हुआ उसको?
अरे हुआ कुछ नहीं, वो किसी लड़के को पसंद करती थी और दो दिन पहले ही उसने घर में किसी को बताए बिना मंदिर में शादी कर ली।
ओह्ह, ये तो बहुत बुरा हुआ, ये आजकल के बच्चे भी न, माँ बाप की बिल्कुल फिक्र नहीं है इनको। ऐसे मामलों में संबंध भी बिगड़ते हैं और घर की इज्ज़त भी जाती रहती है।
हाँ सच कहा लेकिन क्या करें अरु, आजकल के बच्चे पढ़ लिख कर खुद को इतना समझदार समझने लगते हैं, ज़िन्दगी के बड़े फैसलों में भी माँ-बाप से सलाह नहीं लेते।
हाँ सच कहा विनय तुमने।
अरे अब तुम क्यों उदास हो, विनय ने अरु से पूछा
हमारी भी बेटी है, पता नहीं क्या होगा बड़ा खराब समय चल रहा है। मुझे तो बहुत चिंता हो रही है, सुनो मनु की पढ़ाई पूरी होते ही उसकी शादी कर देंगे। हाँ अभी से अच्छा सा लड़का देखना शुरू कर दो।
अरे तुम तो बेकार परेशान हो रही हो, विनय ने अरु का हाथ पकड़ते हुए कहा। ज्यादा सोचना सेहत के लिए खराब है,  वैसे हमारी मनु बहुत समझदार है, अच्छा अब मेरे लिए एक कप चाय बना दो।
अरु के जाते ही विनय भी सोचने लगा, आखिर अरु ठीक ही कह रही है, आजकल के बच्चे जवानी की दहलीज पे पहुंचते ही खुद को समझदार समझ लेते हैं और अक्सर बड़ी गलतियां कर देते हैं। खैर उसने खुद को तसल्ली दी कि उसकी बेटी ऐसा कोई कदम नहीं उठाएगी। इतने में अरु चाय लेकर आ गई और वो चाय पीने लगा, लेकिन उसके दिमाग में यही उधेड़बुन चल रही थी।
दूसरे दिन विनय ऑफिस जाने के लिए घर से निकल ही रहा था कि पीछे से मनु ने आवाज़ दी.. पापा मुझे आपसे कुछ जरूरी बात करनी है,
हाँ बेटा बोलो, विनय ने कहा
पापा लेकिन, इतना कहकर मनु रुक गई
क्या हुआ घबराओ नहीं, विनय ने कहा
वो पापा मैं...
ऐसी क्या बात है मनु की तुम कह नहीं पा रही हो। पहले तो कभी ऐसा नहीं हुआ, जरूर कोई गंभीर बात है.. विनय ने थोड़ा सख़्त लहज़े में कहा।
पापा का सख़्त लहज़ा समझते ही मनु रोने लगी
मनु को रोता देख विनय ने थोड़ी नरमी दिखाते हुए कहा अरे क्या हुआ बेटू, रोना बंद करो और जो कहना है बेझिझक कहो अपने पापा से
जी पापा
लेकिन मनु चुप रही
मनु को चुप देखकर विनय समझ गया कि मामला कुछ गड़बड़ है, उसने तुरंत आफिस फ़ोन लगा कर छुट्टी ले ली।
आफिस फोन करने के बाद उसने मनु से कहा, देखो बेटा मैं ये तो समझ रहा हूँ कि कोई बड़ी बात है, अन्यथा तुम बात कहने में इतना नहीं डरती
फिर उसने कहा क्या हुआ क्या रिजल्ट बिगड़ने का डर है...
नहीं पापा, मनु ने जवाब दिया
इतने में अरु भी वहां आकर बैठ गई और मनु से पूछा तो क्या बात है खुलकर कहो...
मम्मी-पापा को सामने देखकर मनु थोड़ा डर रही थी, लेकिन हिम्मत करते हुए उसने कह ही दिया..पापा वो मैं एक लड़के से...
इससे पहले मनु पूरी बात कहती अरु डांटते हुए बोल पड़ी तो कॉलेज में यही करने जाती हो, हमारी इज्ज़त का कोई ध्यान ही नहीं है...
अरु कुछ और कहती विनय ने उसे रोक दिया और मनु से कहा देखो बेटा हमें तुम्हारी पसंद से कोई एतराज नहीं है लेकिन तुम पहले अपनी पढ़ाई पूरी कर लो और हां उस लड़के को कभी घर बुलाओ। अच्छा वैसे क्या नाम है उसका
जी पापा आर्ष, मनु ने जवाब दिया
ओके, अब तुम जाओ और अपनी पढ़ाई पे ध्यान दो।
मनु के जाते ही अरु ने विनय से कहा अब क्या होगा और आपने भी उसे नहीं डाँटा
विनय ने सहजता से जवाब दिया देखो ये नई उम्र के बच्चें हैं इन्हें कैसे समझाना है मुझे पता है, सख़्ती करने का परिणाम और बुरा हो सकता है। वैसे हमें मनु की शादी करना ही है, अगर लड़का और उसके घर वाले भले हुए तो सोचेंगे।
लेकिन अरु ने संदेह की दृष्टि से विनय को देखा.
देखो अरु समय बदल चुका है, अब हमारा समय नहीं रहा, ये कहते हुए विनय अपने कमरे में चला गया।
एक हफ्ते बाद रविवार के दिन...
पापा आज मैंने आर्ष को लंच पे बुलाया है
अच्छा, तभी तुम आज सुबह से किचन में हो, विनय ने मजाकिया लहज़े में कहा
पापा से ऐसा सुनते ही मनु थोड़ा शरमा गई और तुरंत सामान्य होते हुए कहा पापा वो आपसे मिलना चाहता है
ठीक है अच्छा किया हम भी उससे मिलना चाहते हैं
ठीक 12 बजे डोर वेल बजी तो मनु ने दौड़कर दरवाज़ा खोला, सामने आर्ष ही था।
अंदर आते ही आर्ष ने विनय के पांव छुए और सामने बैठ गया
कब से और कैसे जानते हो एक दूसरे को...आर्ष के बैठते ही विनय ने पूछा
अचानक सवाल पूछने से आर्ष हकबका गया
ये देख विनय मुस्कुरा दिया फिर थोड़ा संकोच के बाद बोला
जी तीन साल से जानता हूँ
अच्छा, कहाँ मिले थे तुम लोग विनय ने फिर पूछा
जी वो मेन मार्केट वाली सड़क पे
विनय को ऐसे जवाब की उम्मीद नहीं थी विनय को लगा दोनों कॉलेज में साथ पढ़ते होंगे इसलिये उसने दोनों को आश्चर्य से देखा आर्ष ने कहा
वो क्या है न अंकल तीन साल पहले मनु और मेरी गाड़ी आपस में टकरा गई और मेरे हाथ की हड्डी क्रेक हो गई थी, जिसके बाद मनु मुझे एक दो बार घर देखने आई, बस तबसे हमें लगा कि हम एक दूसरे को पसंद करने लगे हैं और अब शादी करना चाहते हैं, आर्ष एक सांस में बोल गया।
इतने में अरु ने सबको खाने के लिये आवाज़ दी।
खाना खाने के बाद विनय ने पूछा
क्या करते हो आर्ष, आर्ष ने कहा अंकल छोटा सा व्यापार है उसमें पापा का हाथ बटाता हूँ।
किस चीज़ का व्यापार है, विनय ने कहा
जी आयर्वेदिक दवा बनाने का, आर्ष ने जवाब दिया
विनय ने फिर आश्चर्य से देखा और पूछा किस नाम से
आर्ष ने सहजता से जवाब दिया जी धनवंतरि आयुर्वेद के नाम से
इतना सुनते ही विनय एकदम चौंक गया
तुम आयुर्वेदाचार्य जी के बेटे हो
हाँ अंकल आर्ष ने जवाब दिया
लेकिन बेटा अब विनय का लहज़ा बहुत ही नरमी वाला था, तुम्हारे पिता क्या इस रिश्ते के लिये तैयार होंगे
कहाँ आप लोग और कहाँ हम
जी जरूर होंगे आर्ष ने कहा
लेकिन अब विनय को कुछ नहीं सूझा कि वो क्या कहे,
विनय की स्थिति भांपकर आर्ष ने कहा देखिए आप परेशान न होइए और वो चला गया।
उसके जाते ही विनय ने खुद को संयत किया और मनु से कहा देखो बेटा आर्ष अच्छा लड़का है लेकिन हम दोनों परिवारों के बीच जो एक बड़ा अंतर है उसे सहजता से न लेना। तुम भी समझदार हो, शादी के बाद जीवन दुश्वार हो इससे अच्छा है कोई हमारे स्तर का परिवार देखा जाए और तुम्हारी शादी कर दी जाए
विनय की बात सुनकर मनु उदास हो गई, लेकिन फिर कहा
पापा लेकिन इतनी सारी लव मैरिज होती हैं, उनमे तो ये सब नहीं देखा जाता...
मनु की बात सुनकर विनय ने कहा हां बेटा हमारे देश मे हज़ारो की संख्या में लव मैरिज होती हैं, लेकिन इसमें निभती सिर्फ कुछ सैकड़ा ही हैं। जानती हो क्यों
मनु ने न में जवाब दिया
विनय ने कहा अक्सर ये होता है कि युवा जिसे प्यार समझते हैं वो प्यार नहीं महज आकर्षण होता है, लेकिन उम्र का प्रभाव ऐसा होता है कि उस समय कुछ नहीं सूझता। न लड़का और न लड़की इस बात को समझते हैं, उन्हें तो बस शादी की पड़ी रहती है, घर वालो की सलाह नहीं लेते, अगर सलाह लेने के बाद घर वाले मना कर दें तो वो भी दुश्मन हो जाते हैं और ऐसे भावावेश में घर से भागकर और घर में बिना बताए ही शादी कर लेते हैं। जवान लड़के पहले खुद को स्थापित करने की बजाए उस आकर्षण जिसे वे प्यार समझते हैं, उसके पीछे भागते हैं, शादी करते हैं और फिर 6-8 महीनों में ही तलाक की नौबत आ जाती है। कारण होता है लड़के का निकम्मा होना और शादी के बाद आपसी सामंजस्य की कमी, दोनों परिवारों का आर्थिक स्तर समान न होना जैसे कई कारण होते हैं जिससे ये शादी टूट जाती है।
लेकिन पापा ये तो अरेंज मैरिज में भी हो सकता है, मनु ने पूछा
विनय ने कहा हाँ बिल्कुल होता भी है, लेकिन इसकी संख्या नगण्य है, क्योंकि यहां परिवार, समाज साथ होता है, विपरीत परिस्थितियों में आर्थिक व सामाजिक सहयोग भी मिलता, इसलिये ऐसे मामले कम होते हैं।
एक बात और सच्चा प्यार जो आजकल के युवा जानते ही नहीं, प्यार पाने में नहीं त्याग में निहित है। सच्चा प्यार कभी भी अपने प्रेम को संकट और विपदा में नहीं जाने देगा। अब तुम कहो जो जीवन भर साथ न निभा सके क्या वो सच्चा प्यार है, जो अपने प्रेम के लिये त्याग न कर सके क्या वो प्यार है।
मनु चुप रही, लेकिन वो सोच रही थी क्या उसकी शादी अरेंज नहीं हो सकती। उसने पापा को कोई जवाब नही दिया और वहां से उठ के चली गई
क्रमशः...

Wednesday, June 7, 2017

आशाओं के दीप जलायें

निराशाओं के घोर तमस में आशाओं के दीप जलायें
भावनाओं से उसे सींच कर अपनेपन का पेड़ लगायें

अभिनंदित हो जहाँ भावना और प्यार से जग सुरभित हो
राग-द्वेष से रहित हृदय में कोमलता ही स्पंदित हो
दुनिया के हर छद्म भूलकर सबको अपना मीत बनायें
आँखों में आकाश बसा हो और प्रकाशित हों सब राहें
सबको अपने गले लगाने प्रस्तुत हो हरदम ये बांहें
जो अपनी गलती पर टोके, उसको अपने पास बिठायें

अपना हो या कोई पराया, प्रेम सदा बातों में छलके
अपनी खामी पर हँस लें हम, ग़ैर के ग़म में आंसू ढलके
आओ मिलकर यही बात हम, सारी दुनिया को समझायें
*रेखचित्र-अनुप्रिया

Monday, June 5, 2017

पर्यावरण दिवस

आज सारी दुनिया विश्व पर्यावरण दिवस मना रही है, अच्छी बात है मनाना भी चाहिए, लेकिन क्या पर्यावरण की फिक्र करने के लिए सिर्फ 24 घंटे काफी हैं। आप सब भी समझते हैं कि नहीं है, हमें अपनी हर सांस के साथ पर्यावरण की चिंता होनी चाहिए, क्योंकि हम सांसों के माध्यम से जो आक्सीजन अपने शरीर में भर रहे हैं, वो पर्यावरण का महत्वपूर्ण हिस्सा है। हमें पानी पीते समय पर्यावरण की चिंता करनी चाहिए, क्योंकि हम जो पानी पी रहे हैं वो भी पर्यावरण का हिस्सा है। हमें सुंदर प्राकृतिक दृश्यों का आनंद लेते समय पर्यावरण की चिंता करनी चाहिए, क्योंकि ये सब भी पर्यावरण का हिस्सा है, यानि की हमें हर पल पर्यावरण की चिंता करनी चाहिए। 

पर्यावरण यानि पर्या जो हमारे चारों ओर है और आवरण जो हमें चारों ओर से घेरे हुये है। इसका सीधा मतलब है कि हम जिस आवरण से जन्म से लेकर मृत्युपर्यंत तक घिरे रहते हैं और इसका प्रत्येक अंश हमारे लिए जीवनोपयोगी है, फिर भी हम उसे नुकसान पहुंचाने में जरा भी संकोच नहीं करते। हम ये तो नहीं सोचते कि हम प्रकृति के जिन अंशों को क्षति पहुंचा रहे हैं, उनके न होने पर हमारी मृत्यु निश्चित है, लेकिन क्या करें हमारी मानसिकता सिर्फ अपने सुख तक सीमित है और स्वयं के लाभ से ज्यादा हमारा दिमाग कुछ नहीं सोचता। जब भी कोई ऐसी आपदा आती है तो हम अपने कर्तव्यों को नजरअंदाज शासन व समाज को कोसने लगते हैं, लेकिन ये नहीं सोचते कि हमने अब तक अपने अलावा शासन व समाज के लिए क्या किया, अपने पर्यावरण के लिए क्या किया। अभी भी समय है अगर हम अभी नहीं चेते तो हमारा और इस धरा का अंत निश्चित है, इसलिए ऐसा करें कि हमारा हर दिन पर्यावरण दिवस हो।

तुम्हारे ख्यालों की रिमझिम सी बारिश

कई दिन से चुप तेरी यादों के पंछी
फिर सहन-ए-दिल में चहकने लगे हैं
ख़्वाबों के मौसम भी आकर हमारी
आँखों मे फिर से महकने लगे हैं

उमंगों की सूखी नदी के किनारे
आशाओं की नाव टूटी पड़ी है
तपती हुई रेत में ज़िन्दगी की
हमारी उम्मीदों की बस्ती खड़ी है
ज़मीं देखकर दिल की तपती हुई ये
अश्क़ों के बादल बरसने लगे हैं

हर एक शाम तन्हाइयों में हमारी
मौसम तुम्हारी ही यादें जगाये
तुम्हारे ख्यालों की रिमझिम सी बारिश
मुहब्बत का मुरझाया गुलशन सजाये
पाकर के अपने ख्यालों में तुमको
अरमान दिल के मचलने लगे हैं

ज़ेहन में तो बस तुम ही तुम हो हमारे
मगर दिल को अब तुमसे निस्बत नहीं है
तुम्हें चाहते हैं बहुत अब भी लेकिन
है सच अब तुम्हारी जरूरत नहीं है
भुला दें तुम्हें या न भूलें तुम्हें हम
खुद से ही खुद अब उलझने लगे हैं


आँखों का पानी लिखता हूँ

शब्दों की ज़ुबानी लिखता हूँ
गीतों की कहानी लिखता हूँ

दर्दों के विस्तृत अम्बर में
भावों के पंक्षी उड़ते हैं
नाचें हैं शरारे उल्फ़त के
जब तार ह्रदय के जुड़ते हैं
हर सुबह से शबनम लेकर
फिर शाम सुहानी लिखता हूँ

जब दर्द से जुड़ता है रिश्ता
हर बात प्रीत से होती है
तब भावनाओं के धागे में
अश्क़ों को आँख पिरोती है
ऐसे ही अपनेपन को मैं
रिश्तों की निशानी लिखता हूँ
पानी में आँखों के भीतर
ये नमक ग़मों का घुलता है
जब नेह की होती है बारिश
तब मैल ह्रदय का धुलता है
दरिया से निर्मल जल सा मैं
आँखों का पानी लिखता हूँ 
*रेखाचित्र-अनुप्रिया

Saturday, June 3, 2017

अनुरागों का किल्लोल कहाँ

ये सहज प्रेम से विमुख ह्रदय
क्यों अपनी गरिमा खोते हैं
समझौतों पर आधारित जो
वो रिश्ते भार ही होते हैं

क्षण-भंगुर से इस जीवन सा हम
आओ हर पल को जी लें
जो मिले घृणा से, अमृत त्यागें
और प्रेम का विष पी लें
स्वीकारें वो ही उत्प्रेरण, जो
बीज अमन के बोते हैं

आशाओं का दामन थामे
हर दुःख का मरुथल पार करें
इस व्यथित हक़ीकत की दुनिया में 
सपनो को साकार करें
सुबह गए पंक्षी खा-पीकर, जो
शाम हुई घर लौटे हैं

जो ह्रदय, हीन है भावों से
उसमें निष्ठा का मोल कहाँ
उसके मानस की नदिया में
अनुरागों का किल्लोल कहाँ
है जीवित, जो दूजे दुख में
अपने एहसास भिगोते हैं 
*रेखाचित्र-अनुप्रिया