Tuesday, January 31, 2017

इकरार नहीं होता


इन्कार   नहीं   होता   इकरार  नहीं  होता
कुछ भी तो यहाँ दिल के अनुसार नहीं होता

लेगी मेरी मोहब्बत अंगड़ाई तेरे दिल में
कोई भी मोहब्बत से बेज़ार नहीं होता

अब शोख़ अदाओं का जादू भी चले दिल पर
ऐसे   तो   दिलबरों का   सत्कार नहीं होता

कैसे भुला दूँ, तुझसे, मंज़र वो बिछड़ने का
एहसास   ज़िन्दगी  का हर बार नहीं होता

सुनकर सदायें दिल की फ़ौरन ही चले आना
अब और   नदीश  हमसे इसरार नहीं होता

रेखाचित्र साभार : अनु प्रिया जी

Monday, January 30, 2017

चांदनी के फूल


झरते तुम्हारी आँख से जानम नमी के फूल
खिलने लगे हैं दिल में मेरे तिश्नगी के फूल 

भटके न  राहगीर  कोई  राह  प्यर   की
रक्खें हैं हमने रहगुज़र में रौशनी के फूल 

दिल में तुम्हारी याद का जो चाँद खिल गया
झरने लगे हैं  आँख से भी   चांदनी के फूल 

बोएंगे मुसलसल जो सभी दुश्मनी के बीज
देखेगी कैसे नस्ल कल की दोस्ती के फूल 

हस्ती को अपनी पहले मुकम्मल तो कीजिये
खिलते हैं बहुत मुश्किलों से आदमी के फूल 

अपना लिए हैं जब से तुमने ग़म मेरे सनम
हर सांस महकती है लिए बन्दिगी के फूल 

है तसफिये कि ख़ुशी से बेहतर ग़म-ए-हयात
खिलते हैं  दर्द के चमन में ज़िन्दगी के फूल 

छूकर गुले-ख्याल-ए-नाज़ुकी को तुम्हारी
होंठो  पे गुनगुना   रहे   हैं शायरी के फूल 

भूलेगा कैसे तुझको ज़माना कभी नदीश
अशआर तेरे आये हैं  लेके  सदी के फूल 

चित्र साभार-गूगल


Sunday, January 29, 2017

तो ग़ज़ल कहूँ


रुख़ से ज़रा नक़ाब उठे तो ग़ज़ल कहूँ,
महफ़िल में इज़्तिराब उठे तो ग़ज़ल कहूँ

इस आस में ही मैंने खराशें क़ुबूल की,
काँटों से जब गुलाब उठे तो ग़ज़ल कहूँ

छेड़ा है तेरी याद को मैंने बस इसलिए
तकलीफ बेहिसाब उठे तो ग़ज़ल कहूँ

अँगड़ाइयों को आपकी मोहताज है नज़र
सोया हुआ शबाब उठे तो ग़ज़ल कहूँ

दर्दों की इंतिहा से गुज़र के जेहन में जब
जज्बों का इन्किलाब उठे तो ग़ज़ल कहूँ

तारे समेटने के लिए शोख़ फ़लक से
धरती से माहताब उठे तो ग़ज़ल कहूँ

ठहरी है ग़म की झील में आँखें नदीश की
यादों का इक हुबाब उठे तो ग़ज़ल कहूँ

चित्र साभार: गूगल