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Showing posts from February, 2017

पलकों की नमी अच्छी लगी

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याद के त्यौहार को तेरी कमी अच्छी लगी
बात, तपते ज़िस्म को ये शबनमी अच्छी लगी
 इसलिये हम लौट आये प्यास लेकर झील से
खुश्क लब को नीम पलकों की नमी अच्छी लगी

आदमी की तरह

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प्यार हमने किया जिंदगी की तरह आप हरदम मिले अजनबी की तरह
मैं भी इन्सां हूँ, इन्सान हैं आप भी फिर क्यों मिलते नहीं आदमी की तरह
मेरे सीने में भी इक धड़कता है दिल प्यार यूँ न करें दिल्लगी की तरह
दोस्त बन के निभाई है जिनसे वफ़ा दोस्ती कर रहे हैं दुश्मनी की तरह
हमको कोई गिला ग़म से होता नहीं ग़र ख़ुशी कोई मिलती ख़ुशी की तरह
आज फिर से मेरे दिल ने पाया सुकूं सोचकर आपको शायरी की तरह
ग़म की राहों में जब भी अँधेरे बढ़े अश्क़ बिखरे सदा चांदनी की तरह काश दिल को तुम्हारे ये आता समझ इश्क़ मेरा नहीं हर किसी की तरह
याद आई है जब भी तुम्हारी नदीश तीरगी में हुई रौशनी की तरह
*चित्र साभार-गूगल

नाम पे मेरे

अपनी आंखों से मुहब्बत का बयाना कर दे 
नाम  पे  मेरे  ये  अनमोल  खज़ाना  कर दे
सिमटा रहता है किसी कोने में बच्चे जैसा
मेरे  अहसास को  छू  ले  तू  सयाना कर दे

तलाश हो गया

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जो मेरा था तलाश हो गया
हाँ यक़ीन था काश हो गया
मेरी आँखों में चहकता था
परिंदा ख़्वाबों का लाश हो गया

रूठ के जाना किसी का

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दूर हमने यूँ तीरगी कर ली जला के दिल को रौशनी कर ली दोस्ती है फ़रेब जान के ये जो मिला उससे दुश्मनी कर ली
ज़िन्दगी कैसे रहबरी करती मौत ने मेरी रहज़नी कर ली
इसलिए हो गए खफ़ा आंसू सिर्फ उम्मीद-ए-ख़ुशी कर ली
गिर गए आईने की आँखों से अक्स ने जैसे ख़ुदकुशी कर ली
रूठ के जाना किसी का ऐ नदीश रूह ने जैसे बेरुख़ी कर ली

श्रृंगार ख़्वाबों का

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●●■◆■◆■●●  रंग भरूँ शोख़ी में आज शबाबों का रुख़ पे तेरे मल दूँ अर्क गुलाबों का होंठो का आलिंगन कर यूँ होंठो से, हो जाए श्रृंगार हमारे ख़्वाबों का ●●■◆■◆■●●

यूँ मुसलसल ज़िन्दगी से

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यूँ मुसलसल ज़िन्दगी से मसख़री करते रहे ज़िन्दगी भर  आरज़ू-ए-ज़िन्दगी  करते  रहे 
एक  मुद्दत  से  हक़ीक़त  में नहीं आये यहाँ  ख्वाब की गलियों में जो आवारगी करते रहे 
बड़बड़ाना  अक्स  अपना आईने में देखकर  इस तरह ज़ाहिर वो अपनी  बेबसी करते रहे 
रोकने की कोशिशें तो खूब कीं पलकों ने पर  इश्क़ में  पागल थे  आँसू  ख़ुदकुशी करते रहे

आ गया एहसास के  फिर चीथड़े  ओढ़े  हुए  दर्द  का  लम्हा  जिसे  हम  मुल्तवी करते रहे
दिल्लगी दिल की लगी में फर्क कितना है नदीश  दिल लगाया हमने  जिनसे  दिल्लगी  करते रहे

ठंडी हवा की आँच

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जलते हैं दिल के ज़ख्म ये पा के दवा की आँच होंठो को जलाती है मिरे अब दुआ की आँच 
सोचा था ख्यालों से मिलेगा तेरे सुकून  लेकर गयी क़रार ये राहत फ़ज़ा की आँच
सौदाग़री नहीं है, ये है ज़िन्दगी मेरी रखिये अलग ही इससे नुकसानो-नफ़ा की आंच
तन्हाईयों में आके मेरी शब-ए- फ़िराक़  बेचैन बनती है याद-ए-दिलरुबा की आँच 
महफ़ूज़ कहाँ रक्खूं ये जज़्बात दिल के मैं  लगती है हर तरफ ही यहाँ तो ज़फ़ा की आँच
जो तेरे आशियां से आ रही है वो हवा रंग-ए-जुदाई लेके, है उसमें हिना की आंच
दरिया कोई आग का आई है करके पार  पिघला रही है मुझको ये ठंडी हवा की आँच अश्क़ों के शरारे समेट कर तमाम रोज ख़्वाबों को जगाये है मेरे क्यूं मिज़ा की आंच
क्या हो गया है अब तेरे वादों की धूप को  इसमें बची नहीं है ज़रा भी वफ़ा की आँच
आख़िर ये ज़िस्म जिससे ही होता है जल के ख़ाक देती है रूह को सुकून उस क़ज़ा की आंच
ले के नदीश अपने साथ बर्फ़-ए-दर्द चल  झुलसा ही न दे तुझको ये तेरी अना कि आँच

ख़ुशी कम दिखती है

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धुंधला धुंधला अक़्स, ख़ुशी कम दिखती है ये आँखे जब आईने में नम दिखती है
आ तो गया हमको ग़मों से निभाना लेकिन हमसे अब हर एक ख़ुशी बरहम दिखती है
आँखों में चुभ जाते हैं ख़्वाबों के टुकड़े नींदों में  बेचैनी सी हरदम दिखती है
आसमान कितना रोया है तुम क्या जानो तुमको तो फूलों पे बस शबनम दिखती है दिल तो टूटा है नदीश का माना लेकिन जाने-ग़ज़ल मेरी तू क्यों पुरनम दिखती है
*चित्र साभार-गूगल

जेवर बनाता हूँ

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पलक की सीपियों में अश्क़ को गौहर बनाता हूँ मैं तन्हाई की दुल्हन के लिए जेवर बनाता हूँ
कभी चंपा कभी जूही कभी नर्गिस की पंखुडियां  तेरे  वादों  को मैं  तस्वीर  में  अक्सर  बनाता हूँ
मेरी मंजिल की राहों में खड़ा है आसमां तू क्यूँ ज़रा हट जा मैं अपने हौसले को पर बनाता हूँ
ज़ेहन में  चहचहातें  हैं तुम्हारी  याद के  पंछी मैं जब भी सोच में कोई हसीं मंज़र बनाता हूँ
*चित्र साभार- गूगल


है अपनी जगह

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भला है बुरा है, है अपनी जगह मेरा फ़ैसला है, है अपनी जगह
ज़माना भले बेवफ़ा हो मगर अभी भी वफ़ा है, है अपनी जगह
नहीं प्यार कुछ भी सिवा प्यार के तेरा सोचना है, है अपनी जगह
नज़ारे हसीं लाख दुनिया के हों सनम की अदा है, है अपनी जगह मुलाकातें उनसे हुईं तो बहुत मगर फ़ासला है, है अपनी जगह
रहे कोशिशें दोस्ती की सदा ये शिकवा-गिला है, है अपनी जगह
है ऐसा या वैसा या जैसा नदीश वो सबसे जुदा है, है अपनी जगह चित्र साभार-गूगल

घटा से धूप से और चांदनी से चाहते क्या हो?

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भला मायूस हो क्यूँ आशिकी से चाहते क्या हो? अभी तो आग़ाज़ ही है फिर अभी से चाहते क्या हो?
कहाँ हर आदमी दिल चीर के तुमको दिखायेगा बताओ यार तुम अब हर किसी से चाहते क्या हो?
फ़क़त हों आपके आँगन में ही महदूदो-जलवागर घटा से धूप से और चांदनी से चाहते क्या हो?

वफायें रोक लेंगी तुमको मेरी, है यकीं मुझको दिखाकर इस तरह की बेरुखी से चाहते क्या हो?
छिपा सकते हो कब तक खुद से खुद को तुम नदीश चुराकर आँख अपनी आरसी से चाहते क्या हो?

आंसू अपनी आँख में

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यूँ भी दर्द-ए-ग़ैर बंटाया जा सकता है आंसू अपनी आँख में लाया जा सकता है
खुद को अलग करोगे कैसे, दर्द से बोलो दाग, ज़ख्म का भले मिटाया जा सकता है
मेरी हसरत का हर गुलशन खिला हुआ है फिर कोई तूफ़ान बुलाया जा सकता है
अश्क़ सरापा ख़्वाब मेरे कहते हैं मुझसे ग़म की रेत पे बदन सुखाया जा सकता है पलकों पर ठहरे आंसू पूछे है मुझसे कब तक सब्र का बांध बचाया जा सकता है
वज्न तसल्ली का तेरी मैं उठा न पाऊं  मुझसे मेरा दर्द उठाया जा सकता है
इतनी यादों की दौलत हो गयी इकट्ठी अब नदीश हर वक़्त बिताया जा सकता है


नींद का बिस्तर नहीं मिला

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मकानों के दरम्यान कोई घर नहीं मिला शहर में तेरे प्यार का मंज़र नहीं मिला

झुकी जाती है पलकें ख़्वाबों के बोझ से आँखों को मगर नींद का बिस्तर नहीं मिला
सर पे लगा है जिसके इलज़ाम क़त्ल का हाथों में उसके कोई भी खंज़र नहीं मिला
किस्तों में जीते जीते टुकड़ों में बंट गए खुद को समेट लूँ कभी अवसर नहीं मिला
फिरता है दर्द सैकड़ों लेकर यहां नदीश अपनों की तरह से कोई आकर नहीं मिला

देखते देखते

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टूटा  मेरी  वफ़ा का भरम देखते देखते झूठे  हुए  वादा ओ कसम देखते देखते
किस तरह बदलते हैं  अपना कहने वाले लोग जीते  हैं  तमाशा  ये  हम  देखते देखते
चर्चा रस्मो-रवायत का अब करें किससे भला बदला है किस तरह से अदम देखते देखते

होते हैं रोज़ मोज़िजा कैसे कैसे प्यार में खुशियाँ बनने लगी हैं अलम देखते देखते
इक बार जो आई नदीश लब पे तबस्सुम बढ़ते गए ज़िन्दगी के सितम देखते देखते

मुहब्बत के सफ़र से

न  मिले  चाहे  सुकूं  तेरी  नज़र  से
बारहा  गुजरेंगे  पर उस रहगुज़र से

जिसके होंठो पे तबस्सुम की घटा है
आज पी ली है उसी के चश्मे-तर से

आपने समझा दिया मतलब वफ़ा का
आह  उट्ठी  है  मेरे  टूटे  ज़िगर  से

ग़मज़दा एहसास  हैं, तन्हाइयां  है
लौट  आये  हैं  मुहब्बत  के सफ़र से

आजमा  कर  दोस्तों  को  जा रहे हैं
हम लिए तबियत बुझी, जलते शहर से

थाम  लेगा  लग्ज़िश  में  हाथ  मेरा
है  नदीश  उम्मीद  मेरी,  हमसफ़र से

आँखों में छिपाए रखना

ख्वाब की तरह से आँखों में छिपाए रखना हमको दुनिया की निगाहों से बचाए रखना
बिखर न जाऊं कहीं टूटकर आंसू की तरह मेरे वजूद को पलकों पे उठाए रखना
आज है ग़म तो यक़ीनन ख़ुशी भी आएगी दिल में एक शम्मा तो उम्मीदों की जलाए रखना
तल्ख़ एहसास से महफूज़ रखेगी तुझको मेरी तस्वीर को सीने से लगाए रखना
ग़ज़ल नहीं, है ये आइना-ए-हयात मेरी अक्स जब भी देखना एहसास जगाए रखना
ग़मों के साथ मोहब्बत है ये आसान नदीश ख़ुशी की ख्वाहिशों से खुद को बचाए रखना