ठंडी हवा की आँच


जलते हैं दिल के ज़ख्म ये पा के दवा की आँच
होंठो को जलाती है मिरे अब दुआ की आँच 

सोचा था ख्यालों से मिलेगा तेरे सुकून 
लेकर गयी क़रार ये राहत फ़ज़ा की आँच

सौदाग़री नहीं है, ये है ज़िन्दगी मेरी
रखिये अलग ही इससे नुकसानो-नफ़ा की आंच

तन्हाईयों में आके मेरी शब-ए- फ़िराक़ 
बेचैन बनती है याद-ए-दिलरुबा की आँच 

महफ़ूज़ कहाँ रक्खूं ये जज़्बात दिल के मैं 
लगती है हर तरफ ही यहाँ तो ज़फ़ा की आँच

जो तेरे आशियां से आ रही है वो हवा
रंग-ए-जुदाई लेके, है उसमें हिना की आंच

दरिया कोई आग का आई है करके पार 
पिघला रही है मुझको ये ठंडी हवा की आँच
अश्क़ों के शरारे समेट कर तमाम रोज
ख़्वाबों को जगाये है मेरे क्यूं मिज़ा की आंच

क्या हो गया है अब तेरे वादों की धूप को 
इसमें बची नहीं है ज़रा भी वफ़ा की आँच

आख़िर ये ज़िस्म जिससे ही होता है जल के ख़ाक
देती है रूह को सुकून उस क़ज़ा की आंच

ले के नदीश अपने साथ बर्फ़-ए-दर्द चल 
झुलसा ही न दे तुझको ये तेरी अना कि आँच

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