Monday, March 20, 2017

कितना मुश्किल रहा है वो

खोया है कितना, कितना हासिल रहा है वो
अब सोचता हूँ कितना मुश्किल रहा है वो

जिसने अता किये हैं ग़म ज़िन्दगी के मुझको
खुशियों में मेरी हरदम शामिल रहा है वो

क्या फैसला करेगा निर्दोष के वो हक़ में
मुंसिफ बना है मेरा कातिल रहा है वो

पहुँचेगा हकीकत तक दीदार कब सनम का
सपनों के मुसाफिर की मंज़िल रहा है वो

कैसे यक़ीन उसको हो दिल के टूटने का
शीशे की तिज़ारत में शामिल रहा है वो

तूफां में घिर गया हूँ मैं दूर होके उससे 
कश्ती का ज़िन्दगी की साहिल रहा है वो

ता उम्र समझता था जिसको नदीश अपना
गैरों की तरह आकर ही  मिल रहा वो
चित्र साभार-गूगल

Friday, March 17, 2017

हुए गुम क्यूँ


जो आँखों से आंसू झरे, देख लेते

नज़र इक मुझे भी  अरे, देख लेते

हुए गुम क्यूँ आभासी रंगीनियों में

मुहब्बत,  बदन  से  परे, देख लेते




संवरती रही ग़ज़ल


जब भी मेरे ज़ेह्न में संवरती रही ग़ज़ल 

तेरे ही ख़्यालों से महकती रही ग़ज़ल

झरते रहे हैं अश्क़ भी आँखों से दर्द की 

और उँगलियां एहसास की लिखती रही ग़ज़ल

Thursday, March 16, 2017

तस्वीर भेजी है


ख़िल्वत की पोशीदा पीर भेजी है
तुमको ख़्वाबों की ताबीर भेजी है
रंग मुहब्बत का थोड़ा सा भर देना
यादों की बेरंग कुछ तस्वीर भेजी है

Thursday, March 9, 2017

ज़िन्दगी का मौसम


उदास-उदास सा है ज़िन्दगी का मौसम

नहीं आया हुई मुद्दत खुशी का मौसम

दिल कॊ बेचैन किये रहता है नदीश सदा

याद रह जाता है कभी-कभी का मौसम


Sunday, March 5, 2017

बेताब दिल की


सांसों की फिसलती हुई ये डोर थामकर

बेताब दिल की घड़कनों का शोर थामकर

करता हूँ इंतज़ार इसी आस में कि तुम

आओगी कभी तीरगी में भोर थामकर

Thursday, March 2, 2017

विश्वास रहने दो


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लब पे लबों की छुअन का एहसास रहने दो

बस एक पल तो खुद को , मेरे पास रहने दो ।

ये तय है तुम भी छोड़ के जाओगे एक दिन

लेकिन कहीं तो झूठा ही विश्वास रहने दो ।।
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आँख में ठहरा हुआ

वस्ल की शब का है मंज़र आँख में ठहरा हुआ
एक सन्नाटा है सारे शहर में फैला हुआ

दोस्ती-ओ-प्यार की बातें जो की मैंने यहाँ
किस कदर जज़्बात का फिर मेरे तमाशा हुआ

क्यों मैं समझा था सभी मेरे हैं औ' सबका हूँ मैं
सोचता हूँ जाल में रिश्तों के अब उलझा हुआ


फुसफुसा कर क्या कहा जाने ख़ुशी से दर्द ने
आंसुओं के ज़िस्म का हर ज़ख्म है सहमा हुआ

रिस रही थी दर्द की बूंदें भी लफ़्ज़ों से नदीश
घर मेरे अहसास का था इस कदर भीगा हुआ

शायरी के लिये


नज़र को आस नज़र की है मैकशी के लिये
तड़प रहे हैं बहुत आज हम किसी के लिये

नहीं लगता है ये मुमकिन मुझे सफ़र तनहा
हमसफ़र चाहिये मुझको भी ज़िन्दगी के लिये

गाँव में यादों के छाई है जो सावन की घटा
बरस ही जाये तो अच्छा है तिश्नगी के लिये


धूप रख के भी अंधेरों से वफ़ा की हमने
आज दिल भी जलाएंगे रौशनी के लिये

ढले तो आँख से आंसू, मगर ग़ज़ल की तरह
उम्र नदीश की गुजरे तो शायरी के लिये

चित्र साभार-गूगल

Wednesday, March 1, 2017

सीने में छिपाये रक्खा

दिल की उम्मीदों को सीने में छिपाये रक्खा
इन चिराग़ों को हवाओं से बचाये रक्खा

तेरे ख़्याल ने दिन भर मुझे सताया है
हुई जो रात तो ख़्वाबों ने जगाये रक्खा

हमसे मायूस होके लौट गई तन्हाई भी
हमने खुद को तेरी यादों में डुबाये रक्खा

उमड़ पड़ा है ये तूफ़ान देखकर तुमको
मुद्दतों से जिसे इस दिल में दबाये रक्खा

रही बिखेरती ख़ुश्बू नदीश की ग़ज़लें
एक-एक हर्फ़ ने अहसास बनाये रक्खा