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Showing posts from May, 2017

मुक्तक

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उदास-उदास सा है ज़िन्दगी का मौसम
नहीं आया, हुई मुद्दत खुशी का मौसम
दिल को बेचैन किये रहता है नदीश सदा
याद रह जाता है कभी-कभी का मौसम

प्यार की रोशनी से माहताब दिल हुआ
तेरी एक निगाह से बेताब दिल हुआ
हज़ार गुल दिल मे ख़्वाबों के खिल गए
तेरी नज़दीकियों से शादाब दिल हुआ

पल-पल बोझल था मगर कट गई रात
सहर के उजालों में सिमट गई रात
डरा रही थी अंधेरे के जोर पर मुझे
जला जो दिले-नदीश तो छंट गई रात

ये करिश्मा मोहब्बत में होते देखा
लब पे हँसी आँख को रोते देखा
गुजरे है मंज़र भी अजब आँखों से
साहिल को कश्तियां डुबोते देखा

पानी से है बिल्कुल खाली सूरत
लोग लिये फिरते हैं जाली सूरत
खाते हैं अक्सर फ़रेब चेहरे से
देखकर सब ये भोली-भाली सूरत

तेरे ही साथ को साँसों का साथ कहता हूँ
तुझी को 'मैं' तुझी को कायनात कहता हूँ
तेरी पनाह में गुजरे जो चंद पल मेरे
बस उन्हीं लम्हों को सारी हयात कहता हूँ


रेखाचित्र-अनुप्रिया

क्या हो जाएगा

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तुम न होगे तो यूँ भी क्या हो जाएगा कुछ नए ज़ख्मों से राब्ता हो जाएगा
उसको भी तसीरे-उल्फ़त देगी बदल बेवफ़ा हो तो बावफ़ा हो जाएगा
सीख ली उसने मौसम की अदा हँसते-हँसते ही वो खफ़ा हो जाएगा

चाहतें अपनी हमने तो कर दी निसार क्या पता था वो बेवफ़ा हो जाएगा
दर्द मिलते रहें तो न घबरा ऐ दिल दर्द भी तो कभी दवा हो जाएगा
आप कहें तो कभी मुझको अपना नदीश दिल क्या ईमान भी आपका हो जाएगा

तेरे बगैर रहा है

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किस्मत को तो मुझसे पुराना बैर रहा है हर वक़्त तू भी तो खफा सा खैर रहा है
हासिल यही है तज़र्बा-ए-ज़िन्दगी मुझे  किरदार तो अपनों में मेरा गैर रहा है
फिरता रहा बारे-अना लिए तमाम उम्र बनकर के लाश जो पानी में तैर रहा है
पल भर की जुदाई में दिए हैं हज़ार तंज़ कैसे  नदीश  ये  तेरे  बगैर  रहा  है
चित्र साभार-गूगल

संवर जाने दे

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अपनी आँखों के आईने में संवर जाने दे मुझे समेट ले आकर या बिखर जाने दे
मेरी नहीं है तो ये कह दे ज़िन्दगी मुझसे चंद सांसें करूँगा क्या मुझे मर जाने दे
दर्द ही दर्द की दवा है लोग कहते हैं दर्द कोई नया जिगर से गुजर जाने दे
यूँ नहीं होता है इसरार से हमराह कोई गुजर जायेगा तनहा ये सफ़र जाने दे
नदीश आएगा कभी तो हमसफ़र तेरा जहाँ भी जाये मुन्तज़िर ये नज़र जाने दे
चित्र साभार-गूगल

ज़िस्म की खराश देखकर

ख़्वाबे-वफ़ा के ज़िस्म की खराश देखकर इन आँसुओं की बिखरी हुई लाश देखकर जब से चला हूँ मैं कहीं ठहरा न एक पल राहें भी रो पड़ीं मेरी तलाश देखकर


मुरझाता नहीं कभी

आँख से चेहरा तेरा जाता नहीं कभी दिल भूल के भी भूलने पाता नहीं कभी हो धूप ग़म की या कि हो अश्क़ों की बारिशें फूल तेरी यादों का मुरझाता नहीं कभी
★★★

ज़ख्म-ए-दिल मेरा मुस्कुराने लगा

वार जब भी तेरा याद आने लगा ज़ख्म-ए-दिल मेरा मुस्कुराने लगा
लाखों दर्द अपने दिल मे छिपाये हुए अपने चेहरे पे खुशियां सजाये हुए खो गया मैं रिवाजों की इस भीड़ में और खुद से ही खुद को छिपाने लगा
ज़ख्म ख्वाबों के रिसते रहे रातभर दर्द कदमों पे बिछते रहे रातभर तेरे वादों के जख्मों पे फिर मैं सनम तेरी यादों का मरहम लगाने लगा
धूप खिलवत की तन को भिगोती रही चाहतें रात भर मेरी रोती रही फिर भी पतवार उम्मीद की थामकर सब्र की धार मैं आजमाने लगा
हर खुशी को क्यूँ मुझसे ही तकरार था क्यूँ निशाने पे ग़म के मैं हर बार था जब भी, जो भी रुचा छिन गया मुझसे वो जो मेरा था मुझे मुंह चिढ़ाने लगा