Sunday, July 30, 2017

जिंदगी की तरह


प्यार हमने किया जिंदगी की तरह
आप हरदम मिले अजनबी की तरह


मैं भी इन्सां हूँ, इन्सान हैं आप भी
फिर क्यों मिलते नहीं आदमी की तरह

मेरे सीने में भी इक धड़कता है दिल
प्यार यूँ न करें दिल्लगी की तरह


दोस्त बन के निभाई है जिनसे वफ़ा
दोस्ती कर रहे हैं दुश्मनी की तरह

हमको कोई गिला ग़म से होता नहीं
ग़र ख़ुशी कोई मिलती ख़ुशी की तरह


आज फिर से मेरे दिल ने पाया सुकूं
सोचकर आपको शायरी की तरह


ग़म की राहों में जब भी अँधेरे बढ़े
अश्क़ बिखरे सदा चांदनी की तरह


काश दिल को तुम्हारे ये आता समझ
इश्क़ मेरा नहीं हर किसी की तरह


याद आई है जब भी तुम्हारी नदीश
तीरगी में हुई रौशनी की तरह


चित्र साभार-गूगल

Wednesday, July 26, 2017

मौसम दिखाई देता है



कितना ग़मगीन ये आलम दिखाई देता है
हर जगह दर्द का मौसम दिखाई देता है

दिल को आदत सी हो गई है ख़लिश की जैसे
अब तो हर खार भी मरहम दिखाई देता है

तमाम रात रो रहा था चाँद भी तन्हा
ज़मीं का पैरहन ये नम दिखाई देता है

न आ सका तुझे अश्क़ों को छिपाना अब तक
हँसी के साथ-साथ ग़म दिखाई देता है

जहाँ पे दर्द ने जोड़े नहीं कभी रिश्ते
वहाँ का जश्न भी मातम दिखाई देता है

ग़मों की दास्तां किस को सुनाता मैं नदीश
न हमनवां है न हमदम दिखाई देता है

चित्र साभार- गूगल

Monday, July 24, 2017

कहकशां बनाते हैं


पोशीदा बातों को सुर्खियां बनाते हैं
लोग कैसी-कैसी ये कहानियां बनाते हैं

जिनमें मेरे ख़्वाबों का नूर जगमगाता है
वो मेरे आंसू इक कहकशां बनाते हैं


फासला नहीं रक्खा जब बनाने वाले ने
क्यों ये दूरियां फिर हम दरम्यां बनाते हैं

फूल उनकी बातों से किस तरह झरे बोलो
जो सहन में कांटों से गुलसितां बनाते हैं

.

जब नदीश जलाती है धूप इस ज़माने की
हम तुम्हारी यादों से सायबां बनाते हैं

चित्र साभार- गूगल

Sunday, July 23, 2017

छांव बेच आया है-क़तआत


चला शहर को तो वो गांव बेच आया है
अजब मुसाफ़िर है जो पांव बेच आया है
मकां बना लिया माँ-बाप से अलग उसने
शजर ख़रीद लिया छांव बेच आया है
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तेरे ही साथ को सांसों का साथ कहता हूँ
तुझी को मैं, तुझी को कायनात कहता हूँ
तेरी पनाह में गुज़रे जो चंद पल मेरे
बस उन्ही लम्हों को सारी हयात कहता हूँ
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प्यार की रोशनी से माहताब दिल हुआ
तेरी इक निगाह से बेताब दिल हुआ
हजार गुल दिल में ख़्वाबों के खिल गए
तेरी नज़दीकियों से शादाब दिल हुआ
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पल-पल बोझल था, मगर कट गई रात
सहर के उजालों में सिमट गई रात
डरा रही थी अंधेरे के ज़ोर पर मुझे
जला जो दिले-नदीश तो छंट गई रात
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रंग भरूँ शोख़ी में आज शाबाबों का
रुख़ पे तेरे मल दूँ अर्क गुलाबों का
होंठों का आलिंगन कर यूं, होंठों से
हो जाये श्रृंगार हमारे ख़्वाबों का
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किनारों से बहुत रूठा हुआ है
कलेजा नाव का सहमा हुआ है
पटकती सर है, ये बेचैन लहरें
समंदर दर्द में डूबा हुआ है
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चित्र साभार-गूगल

Saturday, July 22, 2017

जुगनू से बिखर जाते हैं

जब भी यादों में सितमगर की उतर जाते हैं 
काफ़िले दर्द के इस दिल से गुज़र जाते हैं

तुम्हारे नाम की हर शै है अमानत मेरी 
अश्क़ पलकों में ही आकर के ठहर जाते हैं

किसी भी काम के नहीं ये आईने अब तो
अक्स आँखों में देखकर ही संवर जाते हैं

इस कदर तंग है तन्हाईयाँ भी यादों से
रास्ते भीड़ के तनहा मुझे कर जाते हैं

देखकर तीरगी बस्ती में उम्मीदों की मिरे
अश्क़ ये टूटकर जुगनू से बिखर जाते हैं

बसा लिया है दिल में दर्द को धड़कन की तरह
ज़ख्म, ये वक़्त गुजरता है तो भर जाते हैं

खिज़ां को क्या कभी ये अफ़सोस हुआ होगा
उसके आने से ये पत्ते क्यों झर जाते हैं

बुझा के रहते हैं दिये जो उम्मीदों के नदीश
रह-ए-हयात में होते हुए मर जाते हैं 

चित्र साभार- गूगल

Thursday, July 20, 2017

वफ़ा की आँच


जलते हैं दिल के ज़ख्म ये पाके दवा की आँच
होंठों को है जलाती मेरे अब दुआ की आँच 

अश्क़ों के शरारे समेट कर तमाम रोज
ख़्वाबों को जगाये है मेरे क्यूं मिज़ा की आंच

सोचा था ख्यालों से मिलेगा तेरे सुकून 
लेकर गयी क़रार ये राहत-फ़ज़ा की आँच 

सौदागरी नहीं है, ये है ज़िंदगी मेरी 
रखिये अलग ही इससे नुक्सानो-नफ़ा की आँच 

महफूज़ कहाँ रक्खूँ ये जज़्बात दिल के मैं 
लगती है हर तरफ ही यहाँ तो ज़फ़ा की आँच 

दरिया ये कोई आग का आई है करके पार
पिघला रही है मुझको ये ठंडी हवा की आँच 

क्या हो गया है अब तेरे वादों की धूप को
इसमें बची नहीं है ज़रा भी वफ़ा की आँच

लेके नदीश अपने साथ बर्फ़-ए-दर्द चल 
झुलसा ही दे न तुझको ये तेरी अना की आँच


*चित्र साभार- गूगल

बेकल बेबस तन्हा मौसम



बिखरी शाम सिसकता मौसम
बेकल बेबस तन्हा मौसम

तन्हाई को समझ रहा है
लेकर चाँद खिसकता मौसम

शब के आंसू चुनने आया
लेकर धूप सुनहरा मौसम

चाँद चौदहवीं का हो छत पर
फिर देखो मचलता मौसम

जुल्फ चांदनी की बिखराकर
बनकर रात महकता मौसम

खिलती कलियों की संगत में
फूलों सा ये खिलता मौसम

तेरी यादों की बूंदों से
ठंडा हुआ दहकता मौसम

धूप-छांव बनकर नदीश की
ग़ज़लों में है ढलता मौसम

Wednesday, July 19, 2017

देश कहाँ है

इन दिनों देश में एक विचित्र सा वातावरण निर्मित हो गया है। लोगों और समुदायों का आपसी विरोध, देश विरोध तक जा पहुंचा है। इससे न देश में प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है, बल्कि सात समंदर पार भी देश की छवि धूमिल हो रही है।

इन दिनों स्थिति ये है कि एक पक्ष कहे कि स्वेदशी अपनाओं तो दूसरा पक्ष देशी कंपनियों की बुराई आरम्भ कर देता है, वहीं दूसरा पक्ष कहे कि ये गलत है, तो पहला पक्ष उसे सही साबित करने में जुट जाता है और इनके बीच की लड़ाई में देश कहीं खो जाता है। देश प्रथम की भावना और मानसिकता का पूरी तरह लोप हो चुका है। कैसी विडंबना है कि कोई ये नहीं सोचता कि देश बचा रहेगा तो हम बचे रहेंगे।

इन सब में एक तीसरा पक्ष भी है, जो बहुत ही भयावह है। जब जब देश के साथ खड़े होने की बात आती है, तीसरे पक्ष का इतिहास बताता है कि वो दुश्मनों के साथ ही रहा है। इन पक्षों के आपसी विरोध में देश कहीं नहीं होता। होता है तो बस स्वहित, लोभ और शक्ति सम्पन्न बनने की हवस। वर्तमान में व्यक्ति पूजा ने देश और देशहित को कहीं पीछे धकेल दिया है। आज सभी पक्षों में आपसी विरोध इतना हो चुका है कि सब एक दूसरे को नेस्तनाबूद कर देना चाहते हैं। आज सब कुछ सोचा जा रहा है लेकिन देश के बारे में नहीं।

*रेखाचित्र-अनुप्रिया

Tuesday, July 18, 2017

जो भी ख़लिश थी दिल में


जो भी ख़लिश थी दिल में एहसास हो गयी है
दर्द निस्बत मुझे कुछ खास हो गयी है

वजूद हर ख़ुशी का ग़म से है इस जहाँ में
फिर जिंदगी क्यूँ इतनी उदास हो गयी है

चराग़ जल रहा है यूँ मेरी मोहब्बत का
दिल है दीया, तमन्ना कपास हो गयी है

शिकवा नहीं है कोई अब उनसे बेरूखी का
यादों में मोहब्बत की अरदास हो गयी है

नदीश मोहब्बत में वो वक़्त आ गया है
तस्कीन प्यास की भी अब प्यास हो गयी है

*चित्र साभार- गूगल

Sunday, July 16, 2017

सीने से लगाये रखना

ख़्वाब की तरह से आँखों में छिपाये रखना
हमको दुनिया की निगाहों से बचाये रखना

बिखर न जाऊँ कहीं टूट के आंसू की तरह
मेरे  वजूद  को  पलकों  पे  उठाये  रखना

आज है ग़म तो यक़ीनन ख़ुशी भी आएगी
दिल में इक शम्मा तो उम्मीदों की जलाये रखना

तल्ख़  एहसास से  महफ़ूज रखेगी तुझको
मेरी  तस्वीर  को  सीने  से  लगाये  रखना

ग़ज़ल  नहीं, है  ये  आइना-ए- हयात  मेरी
अक़्स जब भी देखना एहसास जगाये रखना

ग़मों के  साथ मोहब्बत, है  ये आसान नदीश
ख़ुशी की ख्वाहिशों से खुद को बचाये रखना



*चित्र साभार-गूगल


Thursday, July 13, 2017

आदमी से आदमी

रखता नहीं है निस्बतें किसी से आदमी
रिश्तों को ढ़ो रहा है आजिज़ी से आदमी

धोखा फ़रेब खून-ए-वफ़ा रस्म हो गए
डरने लगा है अब तो दोस्ती से आदमी

मिलती नहीं हवा भी चराग़ों से इस तरह
मिलता है जिस तरह से आदमी से आदमी

शिकवा ग़मों का यूँ तो हर एक पल से है यहाँ
ख़ुश भी नहीं हुआ मगर ख़ुशी से आदमी

अच्छा है कि  नदीश मुकम्मल नहीं है तू
पता है कुछ नया किसी कमी से आदमी

*चित्र साभार-अनुप्रिया

Saturday, July 8, 2017

मौसम है दिल में

वीरानियों का वो आलम है दिल में
मर्ग़-ए-तमन्ना का मातम है दिल में

ठहरा हुआ है अश्कों का बादल
सदियों से बस एक मौसम है दिल में



धुंधला रही है तस्वीर-ए-ख़्वाहिश
उम्मीदों का हर सफ़ह नम है दिल में

मुझको पुकारा है तूने यक़ीनन
ये दर्द शायद तभी कम है दिल में

हंसकर हंसी ने, हंसी में ये पूछा
बताओ नदीश क्या कोई ग़म है दिल में

Tuesday, July 4, 2017

मार देते हैं

लड़कपन को भी, जो दिल में है अक्सर मार देते हैं
मेरे ख़्वाबों को सच्चाई के मंज़र मार देते हैं

वफ़ाएं अपनी राह-ए-इश्क़ में जब भी रखी हमने
हिक़ारत से ज़माने वाले ठोकर मार देते हैं

नहीं गैरों की कोई फ़िक्र मैं अपनों से सहमा हूँ
बचाकर आँख जो पीछे से खंज़र मार देते हैं

कभी जब सांस लेती है मेरे एहसास की तितली
यहाँ के लोग तो फूलों को पत्थर मार देते हैं

कहाँ मारोगे कितने मारोगे तलवार से बोलो
सुना है लफ्ज़ से ही लोग लश्कर मार देते हैं
ये लहरों के कबीले ज़ुस्तज़ू में किसकी पागल हैं
पलट कर बारहा साहिल पे जो सर मार देते हैं

कभी तो खोदकर देखो नदीश ज़िस्म की तुरबत
मिलेंगी ख्वाहिशें हम जिनको अंदर मार देते हैं

*चित्र साभार-गूगल

Sunday, July 2, 2017

औलाद का फर्ज़

नहीं अब तुम्हें नौकरी नहीं मिल सकती...
ऐसा न कहो सेठ जी नौकरी न रही तो मैं और मेरा परिवार भूखा मर जायेगा...मुन्ना ने गिड़गिगते हुए चमन सेठ से कहा।
चमन सेठ-तो बिना बताए आठ महीने कहाँ चला गया था, इतने दिन पेट कैसे भरा तेरा, अब तुझे नौकरी नहीं मिलेगी मुन्ना, मैंने दूसरा आदमी रख लिया है।
ऐसा न करो सेठ जी, मैं कहाँ जाऊंगा, सालों तक आपके यहां नौकरी की है, अब दूसरा ठिकाना कहाँ ढूँढू, मुन्ना फिर गिड़गिड़ाया।
तुझे पहले ये सब याद नहीं रहा, जो अब ये सब कह रहा है, आखिर गया कहाँ था तू, चमन सेठ ने मुन्ना को डपटते हुए कहा।
गांव चला गया था सेठ जी, पिता जी बीमार थे, उनकी सेवा करते इतने दिन गुजर गए, मुन्ना ने कहा।
चमन सेठ- अरे और कोई नहीं है घर में उनकी सेवा के लिए, जो तू आठ महीने गायब रहा।
मुन्ना-नहीं है सेठ जी, कोई नहीं मेरे सिवा। मेरे माँ-पिता ने अपना फर्ज निभाया और अब मुझे अपना फर्ज निभाना है। पिता की सेवा का अवसर मिला ये तो मेरा सौभाग्य है, ज्यादा दिन उनकी सेवा नहीं कर पाया इसका दुख है। कितने कष्ट सहकर उन्होंने मुझे पाला पोसा था।
चमन सेठ-बस कर, ये तो हर माँ-बाप का फर्ज़ होता है, इसमें नई बात क्या है।
मुन्ना-हाँ सेठ जी बच्चों का पालन पोषण हर माँ-बाप का फर्ज होता है, तो क्या औलाद का कोई फ़र्ज़ नहीं।
चमन सेठ- ठीक है, चुप कर आ जाना कल से।
मुन्ना- बहुत बहुत कृपा है आपकी सेठ जी। इतना कह कर मुन्ना चला गया।
इधर मुन्ना के जाने के बाद चमन सेठ के कान में ये शब्द हथौड़े की तरह पड़ रहे थे, तो क्या औलाद का कोई फर्ज़ नहीं। तीन महीने से उसके पिता भी तो अस्पताल में भर्ती हैं और वो तीन बार भी नहीं गया उनसे मिलने।
मुन्ना के ये शब्द चमन सेठ को बार बार बेचैन कर रहे थे, उसे रात में नींद भी अच्छे से नहीं आई।
सुबह होते ही चमन सेठ जल्दी से तैयार होकर अस्पताल पहुंचा और पिता के पैरों के पास बैठ गया। पिता ने आंख खोलकर देखा तो चमन सेठ पिता से लिपट कर फूट-फूट कर रोने लगा। पिता ने धीरे से सिर पर हाथ फेर के कहा- चमन मेरे बेटे मुझे कोई गिला नहीं तुमसे।
चमन ने कहा-मुझे क्षमा कर दो पिता जी।
इधर पिता बेटे के सिर पे हाथ फेर रहे थे, उधर आंसुओं से धुल के मन का मैल साफ हो रहा था।
*रेखाचित्र-अनुप्रिया

Saturday, July 1, 2017

अच्छा नहीं लगता

मंज़र दिल का उदास अच्छा नहीं लगता
तुम नहीं होते पास अच्छा नहीं लगता

तेरी क़दबुलन्दी से नहीं इनकार कोई
लेकिन छोटे एहसास, अच्छा नहीं लगता

जैसे भी हैं हम रहने दो वैसा ही हमको
बनके कुछ रहना खास अच्छा नहीं लगता

जब से तेरी यादों ने बसाया है घर दिल में
ये क़ाफ़िला-ए-अन्फास अच्छा नहीं लगता

ये मुखौटों से कह दो जाकर नदीश अब
सच का इतना भी पास अच्छा नहीं लगता

*चित्र साभार-गूगल