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Showing posts from July, 2017

जिंदगी की तरह

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प्यार हमने किया जिंदगी की तरह
आप हरदम मिले अजनबी की तरह

मैं भी इन्सां हूँ, इन्सान हैं आप भी
फिर क्यों मिलते नहीं आदमी की तरह

मेरे सीने में भी इक धड़कता है दिल
प्यार यूँ न करें दिल्लगी की तरह

दोस्त बन के निभाई है जिनसे वफ़ा
दोस्ती कर रहे हैं दुश्मनी की तरह
हमको कोई गिला ग़म से होता नहीं
ग़र ख़ुशी कोई मिलती ख़ुशी की तरह

आज फिर से मेरे दिल ने पाया सुकूं
सोचकर आपको शायरी की तरह

ग़म की राहों में जब भी अँधेरे बढ़े
अश्क़ बिखरे सदा चांदनी की तरह

काश दिल को तुम्हारे ये आता समझ
इश्क़ मेरा नहीं हर किसी की तरह

याद आई है जब भी तुम्हारी नदीश
तीरगी में हुई रौशनी की तरह

चित्र साभार-गूगल

मौसम दिखाई देता है

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कितना ग़मगीन ये आलम दिखाई देता है हर जगह दर्द का मौसम दिखाई देता है
दिल को आदत सी हो गई है ख़लिश की जैसे अब तो हर खार भी मरहम दिखाई देता है
तमाम रात रो रहा था चाँद भी तन्हा ज़मीं का पैरहन ये नम दिखाई देता है
न आ सका तुझे अश्क़ों को छिपाना अब तक हँसी के साथ-साथ ग़म दिखाई देता है
जहाँ पे दर्द ने जोड़े नहीं कभी रिश्ते वहाँ का जश्न भी मातम दिखाई देता है
ग़मों की दास्तां किस को सुनाता मैं नदीश न हमनवां है न हमदम दिखाई देता है
चित्र साभार- गूगल

कहकशां बनाते हैं

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पोशीदा बातों को सुर्खियां बनाते हैं लोग कैसी-कैसी ये कहानियां बनाते हैं
जिनमें मेरे ख़्वाबों का नूर जगमगाता है वो मेरे आंसू इक कहकशां बनाते हैं

फासला नहीं रक्खा जब बनाने वाले ने क्यों ये दूरियां फिर हम दरम्यां बनाते हैं
फूल उनकी बातों से किस तरह झरे बोलो जो सहन में कांटों से गुलसितां बनाते हैं
.

जब नदीश जलाती है धूप इस ज़माने की हम तुम्हारी यादों से सायबां बनाते हैं
चित्र साभार- गूगल

छांव बेच आया है-क़तआत

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चला शहर को तो वो गांव बेच आया है अजब मुसाफ़िर है जो पांव बेच आया है मकां बना लिया माँ-बाप से अलग उसने शजर ख़रीद लिया छांव बेच आया है - तेरे ही साथ को सांसों का साथ कहता हूँ तुझी को मैं, तुझी को कायनात कहता हूँ तेरी पनाह में गुज़रे जो चंद पल मेरे बस उन्ही लम्हों को सारी हयात कहता हूँ - प्यार की रोशनी से माहताब दिल हुआ तेरी इक निगाह से बेताब दिल हुआ हजार गुल दिल में ख़्वाबों के खिल गए तेरी नज़दीकियों से शादाब दिल हुआ - पल-पल बोझल था, मगर कट गई रात सहर के उजालों में सिमट गई रात डरा रही थी अंधेरे के ज़ोर पर मुझे जला जो दिले-नदीश तो छंट गई रात - - रंग भरूँ शोख़ी में आज शाबाबों का रुख़ पे तेरे मल दूँ अर्क गुलाबों का होंठों का आलिंगन कर यूं, होंठों से हो जाये श्रृंगार हमारे ख़्वाबों का - किनारों से बहुत रूठा हुआ है कलेजा नाव का सहमा हुआ है पटकती सर है, ये बेचैन लहरें समंदर दर्द में डूबा हुआ है - चित्र साभार-गूगल

जुगनू से बिखर जाते हैं

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जब भी यादों में सितमगर की उतर जाते हैं  काफ़िले दर्द के इस दिल से गुज़र जाते हैं
तुम्हारे नाम की हर शै है अमानत मेरी  अश्क़ पलकों में ही आकर के ठहर जाते हैं
किसी भी काम के नहीं ये आईने अब तो अक्स आँखों में देखकर ही संवर जाते हैं
इस कदर तंग है तन्हाईयाँ भी यादों से रास्ते भीड़ के तनहा मुझे कर जाते हैं
देखकर तीरगी बस्ती में उम्मीदों की मिरे अश्क़ ये टूटकर जुगनू से बिखर जाते हैं
बसा लिया है दिल में दर्द को धड़कन की तरह ज़ख्म, ये वक़्त गुजरता है तो भर जाते हैं
खिज़ां को क्या कभी ये अफ़सोस हुआ होगा उसके आने से ये पत्ते क्यों झर जाते हैं
बुझा के रहते हैं दिये जो उम्मीदों के नदीश रह-ए-हयात में होते हुए मर जाते हैं 
चित्र साभार- गूगल

वफ़ा की आँच

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जलते हैं दिल के ज़ख्म ये पाके दवा की आँच
होंठों को है जलाती मेरे अब दुआ की आँच 
अश्क़ों के शरारे समेट कर तमाम रोज
ख़्वाबों को जगाये है मेरे क्यूं मिज़ा की आंच
सोचा था ख्यालों से मिलेगा तेरे सुकून 
लेकर गयी क़रार ये राहत-फ़ज़ा की आँच 

सौदागरी नहीं है, ये है ज़िंदगी मेरी  रखिये अलग ही इससे नुक्सानो-नफ़ा की आँच 

महफूज़ कहाँ रक्खूँ ये जज़्बात दिल के मैं  लगती है हर तरफ ही यहाँ तो ज़फ़ा की आँच 

दरिया ये कोई आग का आई है करके पार पिघला रही है मुझको ये ठंडी हवा की आँच 

क्या हो गया है अब तेरे वादों की धूप को इसमें बची नहीं है ज़रा भी वफ़ा की आँच

लेके नदीश अपने साथ बर्फ़-ए-दर्द चल 
झुलसा ही दे न तुझको ये तेरी अना की आँच

*चित्र साभार- गूगल

बेकल बेबस तन्हा मौसम

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बिखरी शाम सिसकता मौसम बेकल बेबस तन्हा मौसम
तन्हाई को समझ रहा है लेकर चाँद खिसकता मौसम
शब के आंसू चुनने आया लेकर धूप सुनहरा मौसम
चाँद चौदहवीं का हो छत पर फिर देखो मचलता मौसम
जुल्फ चांदनी की बिखराकर बनकर रात महकता मौसम
खिलती कलियों की संगत में फूलों सा ये खिलता मौसम
तेरी यादों की बूंदों से ठंडा हुआ दहकता मौसम
धूप-छांव बनकर नदीश की ग़ज़लों में है ढलता मौसम

देश कहाँ है

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इन दिनों देश में एक विचित्र सा वातावरण निर्मित हो गया है। लोगों और समुदायों का आपसी विरोध, देश विरोध तक जा पहुंचा है। इससे न देश में प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है, बल्कि सात समंदर पार भी देश की छवि धूमिल हो रही है।

इन दिनों स्थिति ये है कि एक पक्ष कहे कि स्वेदशी अपनाओं तो दूसरा पक्ष देशी कंपनियों की बुराई आरम्भ कर देता है, वहीं दूसरा पक्ष कहे कि ये गलत है, तो पहला पक्ष उसे सही साबित करने में जुट जाता है और इनके बीच की लड़ाई में देश कहीं खो जाता है। देश प्रथम की भावना और मानसिकता का पूरी तरह लोप हो चुका है। कैसी विडंबना है कि कोई ये नहीं सोचता कि देश बचा रहेगा तो हम बचे रहेंगे।

इन सब में एक तीसरा पक्ष भी है, जो बहुत ही भयावह है। जब जब देश के साथ खड़े होने की बात आती है, तीसरे पक्ष का इतिहास बताता है कि वो दुश्मनों के साथ ही रहा है। इन पक्षों के आपसी विरोध में देश कहीं नहीं होता। होता है तो बस स्वहित, लोभ और शक्ति सम्पन्न बनने की हवस। वर्तमान में व्यक्ति पूजा ने देश और देशहित को कहीं पीछे धकेल दिया है। आज सभी पक्षों में आपसी विरोध इतना हो चुका है कि सब एक दूसरे को नेस्तनाबूद कर देना चाहते है…

जो भी ख़लिश थी दिल में

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जो भी ख़लिश थी दिल में एहसास हो गयी है दर्द निस्बत मुझे कुछ खास हो गयी है
वजूद हर ख़ुशी का ग़म से है इस जहाँ में फिर जिंदगी क्यूँ इतनी उदास हो गयी है
चराग़ जल रहा है यूँ मेरी मोहब्बत का दिल है दीया, तमन्ना कपास हो गयी है
शिकवा नहीं है कोई अब उनसे बेरूखी का यादों में मोहब्बत की अरदास हो गयी है
नदीश मोहब्बत में वो वक़्त आ गया है तस्कीन प्यास की भी अब प्यास हो गयी है
*चित्र साभार- गूगल

सीने से लगाये रखना

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ख़्वाब की तरह से आँखों में छिपाये रखना
हमको दुनिया की निगाहों से बचाये रखना

बिखर न जाऊँ कहीं टूट के आंसू की तरह
मेरे  वजूद  को  पलकों  पे  उठाये  रखना

आज है ग़म तो यक़ीनन ख़ुशी भी आएगी
दिल में इक शम्मा तो उम्मीदों की जलाये रखना

तल्ख़  एहसास से  महफ़ूज रखेगी तुझको
मेरी  तस्वीर  को  सीने  से  लगाये  रखना

ग़ज़ल  नहीं, है  ये  आइना-ए- हयात  मेरी
अक़्स जब भी देखना एहसास जगाये रखना

ग़मों के  साथ मोहब्बत, है  ये आसान नदीश
ख़ुशी की ख्वाहिशों से खुद को बचाये रखना



*चित्र साभार-गूगल


आदमी से आदमी

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रखता नहीं है निस्बतें किसी से आदमी रिश्तों को ढ़ो रहा है आजिज़ी से आदमी
धोखा फ़रेब खून-ए-वफ़ा रस्म हो गए डरने लगा है अब तो दोस्ती से आदमी
मिलती नहीं हवा भी चराग़ों से इस तरह मिलता है जिस तरह से आदमी से आदमी

शिकवा ग़मों का यूँ तो हर एक पल से है यहाँ ख़ुश भी नहीं हुआ मगर ख़ुशी से आदमी
अच्छा है कि  नदीश मुकम्मल नहीं है तू पता है कुछ नया किसी कमी से आदमी

*चित्र साभार-अनुप्रिया

मौसम है दिल में

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वीरानियों का वो आलम है दिल में
मर्ग़-ए-तमन्ना का मातम है दिल में

ठहरा हुआ है अश्कों का बादल
सदियों से बस एक मौसम है दिल में



धुंधला रही है तस्वीर-ए-ख़्वाहिश
उम्मीदों का हर सफ़ह नम है दिल में

मुझको पुकारा है तूने यक़ीनन
ये दर्द शायद तभी कम है दिल में

हंसकर हंसी ने, हंसी में ये पूछा
बताओ नदीश क्या कोई ग़म है दिल में

मार देते हैं

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लड़कपन को भी, जो दिल में है अक्सर मार देते हैं
मेरे ख़्वाबों को सच्चाई के मंज़र मार देते हैं

वफ़ाएं अपनी राह-ए-इश्क़ में जब भी रखी हमने
हिक़ारत से ज़माने वाले ठोकर मार देते हैं

नहीं गैरों की कोई फ़िक्र मैं अपनों से सहमा हूँ
बचाकर आँख जो पीछे से खंज़र मार देते हैं

कभी जब सांस लेती है मेरे एहसास की तितली
यहाँ के लोग तो फूलों को पत्थर मार देते हैं

कहाँ मारोगे कितने मारोगे तलवार से बोलो
सुना है लफ्ज़ से ही लोग लश्कर मार देते हैं
ये लहरों के कबीले ज़ुस्तज़ू में किसकी पागल हैं
पलट कर बारहा साहिल पे जो सर मार देते हैं

कभी तो खोदकर देखो नदीश ज़िस्म की तुरबत
मिलेंगी ख्वाहिशें हम जिनको अंदर मार देते हैं

*चित्र साभार-गूगल

औलाद का फर्ज़

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नहीं अब तुम्हें नौकरी नहीं मिल सकती...
ऐसा न कहो सेठ जी नौकरी न रही तो मैं और मेरा परिवार भूखा मर जायेगा...मुन्ना ने गिड़गिगते हुए चमन सेठ से कहा।
चमन सेठ-तो बिना बताए आठ महीने कहाँ चला गया था, इतने दिन पेट कैसे भरा तेरा, अब तुझे नौकरी नहीं मिलेगी मुन्ना, मैंने दूसरा आदमी रख लिया है।
ऐसा न करो सेठ जी, मैं कहाँ जाऊंगा, सालों तक आपके यहां नौकरी की है, अब दूसरा ठिकाना कहाँ ढूँढू, मुन्ना फिर गिड़गिड़ाया।
तुझे पहले ये सब याद नहीं रहा, जो अब ये सब कह रहा है, आखिर गया कहाँ था तू, चमन सेठ ने मुन्ना को डपटते हुए कहा।
गांव चला गया था सेठ जी, पिता जी बीमार थे, उनकी सेवा करते इतने दिन गुजर गए, मुन्ना ने कहा।
चमन सेठ- अरे और कोई नहीं है घर में उनकी सेवा के लिए, जो तू आठ महीने गायब रहा।
मुन्ना-नहीं है सेठ जी, कोई नहीं मेरे सिवा। मेरे माँ-पिता ने अपना फर्ज निभाया और अब मुझे अपना फर्ज निभाना है। पिता की सेवा का अवसर मिला ये तो मेरा सौभाग्य है, ज्यादा दिन उनकी सेवा नहीं कर पाया इसका दुख है। कितने कष्ट सहकर उन्होंने मुझे पाला पोसा था।
चमन सेठ-बस कर, ये तो हर माँ-बाप का फर्ज़ होता है, इसमें नई बात क्या है।

अच्छा नहीं लगता

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मंज़र दिल का उदास अच्छा नहीं लगता
तुम नहीं होते पास अच्छा नहीं लगता

तेरी क़दबुलन्दी से नहीं इनकार कोई
लेकिन छोटे एहसास, अच्छा नहीं लगता

जैसे भी हैं हम रहने दो वैसा ही हमको
बनके कुछ रहना खास अच्छा नहीं लगता

जब से तेरी यादों ने बसाया है घर दिल में
ये क़ाफ़िला-ए-अन्फास अच्छा नहीं लगता

ये मुखौटों से कह दो जाकर नदीश अब
सच का इतना भी पास अच्छा नहीं लगता

*चित्र साभार-गूगल