ज़िन्दगी की किताब के पन्ने

आँखों में 
फिर चमकने लगे हैं 
यादों के कुछ लम्हें
गूंजने लगी हैं कान में 
वो तमाम बातें 
जो कभी हमने की ही नहीं 
नज़र आई कुछ तस्वीरें 
जो वक़्त ने खींच ली होगी 
और तुम्हारा ही नाम 
पढ़ रहा था हर कहीं 
जब पलट रहा था मैं 
ज़िन्दगी की किताब के पन्ने


अमरबेल की तरह

दिल के शज़र की
इक शाख़ पे
इक रोज़
रख दिया था बेचैनी ने
तेरी याद का
इक टुकड़ा
और आज़
दिल के शजर की
कोई शाख़ नहीं दिखती
तेरी याद ने ढ़ाँक लिया है
अमरबेल की तरह
अब वहाँ
दिल नहीं है
सिर्फ तेरी याद है

एहसास की डोलची

दिल के कमरे में अब
पसर चुकी है वीरानी
ख़्वाबों की अलमारी
कब से पड़ी है खाली
उम्मीदों की तस्वीरों ने
खो दिए हैं रंग अपने
आस की खिड़की भी
अब कभी नहीं खुलती
अश्क़ों की नमी से ऊग आई
एक कोने में यादों की काई
हाँ
ठसाठस भरी है दर्द से
एहसास की डोलची




तेरे इंतज़ार की बोझल आँखें
शाम ढ़लते-ढ़लते
हो जाती है ना-उम्मीद
तब
तन्हाई के बिछौने पे
तेरी यादें ओढ़कर
सो जाता हूँ
क्योंकि
कुछ ख़्वाब
इन आँखों की राह तकते हैं
चित्र साभार-गूगल

इक तेरे जाने के बाद

हर शाम ग़मगीं सी
हर सुबह उनींदी सी
हर ख़्याल खोया सा
इक तेरे जाने के बाद
हर वक़्त बिखरा सा
हर अश्क़ दहका सा
एहसास भिगोया सा
इक तेरे जाने के बाद
हर दर्द महका सा
हर वक़्त तन्हा सा
हर ख़्वाब रोया सा
इक तेरे जाने के बाद
हर सांस चुभती सी
हर बात कड़वी सी
हर नाम ढ़ोया सा
इक तेरे जाने के बाद


शब्द बिखर जाते हैं

अक्सर शब्द बिखर जाते हैं
कोशिश बहुत करता हूँ, कि
शब्दों को समेट कर
कोई कविता लिखूं
पर ये हो नहीं पाता
कोशिश बहुत करता हूँ कि
एहसास समेट कर रखूं
पर ये हो नहीं पाता
तकिये पर बिखरे अश्क़ों की तरह
अक्सर शब्द बिखर जाते हैं

शायद तुम नहीं जानती

शायद तुम नहीं जानती
मैंने रोक रक्खा है पलकों के भीतर
आंसुओं के समंदर में 
उठने वाले ज्वार को
बनाकर यादों का तटबंध
कुछ लहरें फिर भी
तोड़ देती हैं तटबंध
और तन्हाई के साहिल पे
छोड़ जाती हैं नमक के किरचे
जो चुभ जाते हैं
सुकून के पाँव में
और सुनाई देती है
करीब आते दर्द की आहट
कुछ तस्वीरें दर्द की
खींच कर वक्त ने
टंगा दी हैं
दिल की दीवार पे
ठोक के एहसास की कीलें
जो चुभती हैं हर सांस की जुंबिश पर
फिर रो पड़ते हैं ख़्वाब मोहब्बत के
और भिगो देते हैं
पलकों की कोरों को
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आँखों की दहलीज़ पे 
बैठे कुछ ख़्वाब,
कब से राह देख रहे हैं नींद की
और नींद भटक रही है
यादों के सहरा में
सुकून के जुगनुओं का
पीछा करते हुए...
ज़िद पे अड़ी थी नींद
आँखों की तलाशी लेने
और मिला क्या
कुछ सुबकते हुए ख़्वाब
चंद धुंधली सी तश्वीरें
एक दरिया अश्कों का
जिसमें तैरती
अरमानों की लाशें
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