लौट गई तन्हाई भी


दिल की उम्मीदों को सीने में छिपाए रक्खा
इन चिरागों को हवाओं से बचाए रक्खा

हमसे मायूस होके लौट गई तन्हाई भी
हमने खुद को तेरी यादों में डुबाए रक्खा

तिरे ख़्याल ने दिन-रात मुझे सताया है
हुई जो रात तो ख़्वाबों ने जगाए रक्खा

वक़्त ने तो दी सदा मुझको मुसलसल लेकिन
मिरी ही धड़कनों ने मुझको भुलाए रक्खा

 उमड़ पड़ा है ये तूफान देखकर तुमको
मुद्दतों से जिसे इस दिल में दबाए रक्खा

 रही बिखेरती ख़ुश्बू नदीश की ग़ज़लें
एक-एक हर्फ़ ने एहसास बनाए रक्खा
चित्र साभार-गूगल

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