मनुष्य के दर्शन

खाली बैठे-बैठे ईश्वर ने सोचा कि चलो धरती का भ्रमण कर अपने बनाये मनुष्य का हालचाल लिया जाए। मनुष्य के आपसी प्रेम और बंधुत्व की भावना को परखा जाए। मनुष्यता और मानवीयता के विषय पर मनुष्य का विकास देखा जाए। धरती पर "मनुष्य" से भेंट की जाए। यही सोचकर धरती पर आए ईश्वर की नज़र एक मंत्री जी पर पड़ी। उन्होंने जान लिया कि मंत्री जी एक सामाजिक कार्यक्रम में जा रहे हैं। ईश्वर ने सोचा कि इसे ही माध्यम बनाया जाए और उन्होंने उसकी काया में प्रवेश कर लिया।
समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में पहुंचे मंत्री जी का भव्य स्वागत देखकर ईश्वर को बड़ी खुशी हुई, उन्हें लगा मनुष्य में आपसी प्रेम कितना विकसित हो गया है। तभी नेताजी को पुष्पहारों से लादकर उनकी चरणवंदना देखकर ईश्वर को जल्द ही समझ में आ गया कि इन सारे प्रयोजनों का आशय कुछ और ही है और ईश्वर को ये देखकर बड़ी निराशा हुई।

तभी सामाजिक संगठन के सचिव ने मंत्री जी से कहा...
आइये मान्यवर आपका सामाजिक बंधुओं से परिचय करा दूँ...
वोट बैंक की मजबूती के लिए मंत्री जी सचिव के साथ चल दिये।
सचिव- मान्यवर ये हैं मिस्टर बिल्डर, शहर की अधिकांश गगनचुम्बी इमारतों के निर्माता और समाज के प्रतिष्ठित सदस्य। ये हैं श्रीमान सर्जन, शहर के सबसे बड़े चिकित्सक।
ये प्रोफेसर महोदय हैं, इन्होंने अनेक विषयों पर पीएचडी की हुई है और अपना खुद का पीजी कॉलेज संचालित करते हैं।
इनसे मिलिए हैं मिस्टर अधिकारी, बहुत ऊंचे पद पर हैं और समाज में इनका काफी रुतबा भी है।
और ये हैं हमारे खास गया प्रसाद जी हैं तो सरकारी कार्यालय में छोटे से पटवारी, लेकिन खानदानी रईस हैं। समाज के कार्य मे बढ़चढ़कर हिस्सा लेते हैं और तन मन धन से सहयोग करते हैं...
तभी ईश्वर की नज़र अलग-थलग खड़े एक व्यक्ति पर पड़ी, उन्होंने पूछा- सचिव महोदय ये साधारण सा व्यक्ति कौन है।
सचिव-अरे मंत्री जी समाज के हैं तो बुलाना पड़ता है। मामूली से शिक्षक हैं, बहुत ही साधारण मनुष्य हैं।

ईश्वर चौंके, क्या कहा मनुष्य है.... फिर सोचा चलो धरती पे आना सार्थक हुआ, निःस्वार्थ आपसी प्रेम और बंधुत्व तो नहीं दिखा, लेकिन मनुष्य के दर्शन हो गए और मन में बहुत सारी कड़वाहट के साथ थोड़ी सी संतुष्टि लेकर वापस लौट गए।

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