ईश्वर से प्रेम करना सिखाएं, डरना नहीं



आस्थावानों के लिए ईश्वर एक सार्वभौमिक शक्ति है, जिसे विभिन्न रूपों में पूजा जाता है। जिसे हम भक्ति कहते हैं, वो भी प्रेम का ही एक अंग है। प्रेम जब अपने चरम पर पहुंचता है, तो भक्ति में परिवर्तित हो जाता है, जिसे ज्ञानी प्रेमयोग भी कहते हैं। हम सब आस्थावान ईश्वर के किसी न किसी रूप की पूजा करते ही हैं।

हम में से बहुतेरे अमूमन एक गलती करते ही हैं, जो ईश्वर साक्षात प्रेम स्वरूप है, हम उसी से अपने से छोटों, खासकर बच्चों को डराकर रखते हैं। ऐसा मत करो नहीं तो ईश्वर पाप देंगे, वैसा मत करो नहीं तो ईश्वर दंड देंगे। लेकिन सोचने वाली बात ये है कि क्या ये कहने से बच्चे ऐसा करना बंद कर देते हैं। नहीं बल्कि इसका उल्टा प्रभाव पड़ता है और वे ईश्वर के समीप जाने की बजाय दूर होने लगते हैं। वे या तो अनिच्छा से पूजा-पाठ करते हैं या उनके मन में समाये डर के कारण। धीरे-धीरे वे अनमने मन से धार्मिक अनुष्ठानों में सम्मिलित होते हैं। उन्हें डर होता है कि कोई गलती हो गई तो, उन्हें पता नहीं क्या दंड मिले। और ऐसे में कोई अनहोनी हो जाये तो, वे अंधविश्वासी होने लगते हैं। ईश्वर का प्रेम जहां उन्हें आत्मविश्वासी बना सकता है, वहीं डर उन्हें अंधविश्वासी। बच्चों को ईश्वर से डराने की बजाय प्रेम करना सिखाएं। उनसे ये कह सकते हैं कि ईश्वर आप से बहुत प्रेम करते हैं, इसलिये ऐसा मत करो अन्यथा ईश्वर रुष्ट हो जाएंगे, ये कदापि न कहें ईश्वर क्रोधित हो जाएंगे। साथ ही इस तरह भी कहा जा सकता है कि ईश्वर ने मनुष्यमात्र, परिवार, समाज के लिये कुछ नियम और अनुशासन बनाया हुआ है, जिसका पालन करना चाहिये, अन्यथा ईश्वर रुष्ट हो जाते हैं, लेकिन वे हम सब से बहुत प्रेम करते हैं और हम सब का ध्यान रखते हैं।

ईश्वर सभी जीवों से प्रेम करते हैं, इसलिए हमें भी उनसे प्रेम करना चाहिए। आरम्भ से ही ईश्वर के प्रति अनुराग उत्पन्न करने वाली बातें कही जाए, न कि डर उत्पन्न करने वाली। आज जहां युवा पीढ़ी के बारे में कहा जा रहा है कि वो अपनी संस्कृति और परंपराओं से कट रही है, वहीं उनमें ईश्वर के प्रति प्रेम जगाया जाए ताकि वे छोटे-बड़े धार्मिक क्रियाकलापों में सम्मिलित हों। हमारे बहुतेरे धार्मिक क्रियाकलाप हमारी संस्कृति और परंपरा का हिस्सा भी हैं, इस तरह हम उन्हें इससे कटने से भी बचा पाएं। वर्तमान में जितना पूजा-पाठ बढ़ा है, उतना ही ईश्वर से लोग विमुख भी हुए हैं, हालांकि ईश्वर निजी आस्था का विषय है, फिर भी कहीं न कहीं बचपन से ईश्वर के नाम पर बनाये गए डर की भी महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। चूंकि मैं ईश्वर के प्रति पूर्ण आस्थावान हूँ, इसलिए मेरा मानना है, कि जो प्रेम स्वरूप परमानंद है, उससे प्रेम करना सिखाएं, डरना नहीं।

चित्र साभार- गूगल

Popular posts from this blog

नींद का बिस्तर नहीं मिला

देखते देखते

सैकड़ों खानों में

प्यार करें